• 02 December, 2022
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‘हाइब्रिड-युद्ध’ के दौर में सिविल-सोसायटी से जुड़े बयान पर हैरत क्यों?

प्रमोद जोशी
शुक्र, 26 नवम्बर 2021   |   6 मिनट में पढ़ें

इस महीने 12 नवंबर को हैदराबाद में सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में भारतीय पुलिस सेवा के प्रोबेशनरी अधिकारियों के 73वें बैच की पासिंग आउट परेड को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने ‘नागरिक समाज को युद्ध का नया मोर्चा’ कहा था। उनके इस बयान पर काफी हंगामा हुआ है। एक लेख में कहा गया कि अजित डोभाल ने सिविल सोसायटी को ‘देश का दुश्मन’ ठहरा दिया है, जबकि ऐसा है नहीं। एक और जगह लिखा गया कि अजित डोभाल ने यह क्यों कहा कि सिविल सोसाइटी ‘युद्ध का चौथा मोर्चा’ है?

युद्ध की अवधारणा

वस्तुतः अजित डोभाल ने चेतावनी दी थी कि युद्ध की अवधारणा बदल रही है। ‘राष्ट्रहित को नुकसान पहुंचाने के लिए सिविल सोसाइटी को भ्रष्ट किया जा सकता है, अधीन बनाया जा सकता है, बाँटा जा सकता है, उसे अपने फायदे में इस्तेमाल किया जा सकता है।’ इस बयान से यह अर्थ नहीं निकलता कि समूची सिविल-सोसायटी दुश्मन है। ‘सिविल-सोसायटी मोर्चा है’ कहने का तात्पर्य है कि उसकी आड़ ली जा सकती है।

सिविल-सोसायटी जागरूक मध्यवर्ग है, पर वह ‘एकमत, एक-स्वर’ जैसी कोई संगठित व्यवस्था नहीं है। उसके भीतर कई धारणाएं-अवधारणाएं और दृष्टिकोण होते हैं। अजित डोभाल के पूरे बयान को पढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा है कि युद्ध के नए हथियार के रूप में सिविल-सोसायटी यानी समाज को नष्ट करने की तैयारी की जा रही है। क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है कि इस्लामिक स्टेट ने भारत में सोशल-मीडिया के मार्फत बाकायदा भरती की थी? 26 जनवरी को लालकिले में जो हिंसा हुई थी, उसे हम कैसे भूल सकते हैं?

आंतरिक-सुरक्षा 

अजित डोभाल रक्षा सलाहकार हैं और उनकी चिंताएं राष्ट्रीय-सुरक्षा से जुड़ी हैं। वे इस बात को रेखांकित कर रहे हैं कि आज हाइब्रिड युद्धों का जमाना है। इस लिहाज से युद्ध का एक मोर्चा सिविल-सोसायटी में भी खुलता है या खोला जा सकता है। हाइब्रिड वॉर की अवधारणा कोई आज की बात नहीं है। इस सहस्राब्दी के शुरू से ही यह बात कही जा रही है। ‘फिफ्थ कॉलम’ (घर के भीतर बैठा दुश्मन) या ‘अदृश्य-शत्रु’ शब्द का इस्तेमाल दूसरे विश्व युद्ध के समय से हो रहा है।

उन्होंने कहा, ‘यदि आंतरिक-सुरक्षा विफल होती है तो कोई देश महान नहीं बन सकता। लोग सुरक्षित नहीं हैं तो वे आगे नहीं बढ़ सकते और देश भी आगे नहीं बढ़ेगा।’ खतरा केवल भौगोलिक-सरहदों तक सीमित नहीं होता, आंतरिक भी होता है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस बात को कई बार कहा था कि नक्सलवाद देश के सामने सबसे बड़ा खतरा है। हम जानते हैं कि ‘लाल गलियारे’ की वैचारिक डोर चीन और पाकिस्तान से जुड़ती है।

हिंसक-प्रतिरोध

कम से कम देश के तीन भौगोलिक-क्षेत्रों में यह खतरा आप देख सकते हैं। कश्मीर में लंबे अरसे से हिंसक-प्रतिरोध जारी है। उन्हीं ताकतों से प्रेरित पंजाब में अलगाववाद को जगाने की कोशिश हो रही है। प्रतिरोध शांतिपूर्ण और केवल वैचारिक होता, तब भी बात थी। उसमें हिंसा है। इन्हें जोड़ने वाले सूत्र अदृश्य हैं, दिखाई नहीं पड़ते। पर क्या हम नहीं जानते हैं कि आईएसआई और चीन की भूमिका इसमें है?

पूर्वोत्तर की हिंसा और ‘लाल गलियारे’ की माओवादी हिंसा को मौन-समर्थन देने वालों को आप क्या मानेंगे? अरुंधती रॉय और उनसे सहमति रखने वाले अनेक व्यक्ति जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों के भारत में विलय को अनुचित मानते हैं। क्या भारत की जनता की भी यही राय है? बेशक लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं विचाराभिव्यक्ति की अनुमति देती हैं, पर उनकी आलोचना करने का हक भी हमारे पास है। इस दुधारी ‘ओवर्ट और कोवर्ट’ तलवार का जिक्र क्यों नहीं होना चाहिए?

तीन-युद्ध रणनीति  

कम्युनिस्ट कहते रहे हैं, ‘पूँजीवाद हमें वह रस्सी बनाकर बेचेगा, जिसके सहारे हम उसे लटकाकर फाँसी देंगे।’ यानी पूँजीवाद की समाप्ति के उपकरण उसके भीतर ही मौजूद हैं। सोशल-मीडिया पर कुछ समय पहले एक अमेरिकी पत्रकार जोशुआ फिलिप का वीडियो वायरल हुआ था। उन्होंने कहा, चीन तीन रणनीतियों का सहारा लेता है। मानसिक, सांविधानिक और मीडिया। यह ‘तीन युद्ध’ रणनीति है।

चीन अपने प्रतिस्पर्धी देशों को उनके ही आदर्शों की रस्सी से बाँधता है। उसके नागरिकों के पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है, प्रतिस्पर्धी देशों में है। वह इसके सहारे लोकतांत्रिक देशों में अराजकता पैदा करता है। आपके यहाँ वाणी की स्वतंत्रता है, तो वह व्यवस्था विरोधी आंदोलनों को हवा देगा। आपकी न्याय व्यवस्था का सहारा लेकर आपको कठघरे में खड़ा किया जाएगा। आपके मीडिया की मदद लेगा। ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया को चीन में घुसने नहीं दिया गया है, पर इनमें चीन-समर्थक हैंडलों की भरमार है। इसके लिए सैकड़ों-हजारों लोगों को बाकायदा भरती किया गया है। यह नए किस्म की सेना है।

चीन-पाक धुरी

हाल की घटना है। 31 अक्टूबर को खालिस्तान समर्थक संगठन सिख फॉर जस्टिस ने खालिस्तान की स्थापना के लिए एक जनमत संग्रह कराया। हालांकि इस जनमत संग्रह का व्यावहारिक असर नहीं होगा, पर हैरत की बात है कि यह कार्यक्रम लंदन में हुआ और ब्रिटिश सरकार ने इसे होने दिया। पिछले तीन दशक से खालिस्तानी-आंदोलन को हवा दी जा रही है। कौन है, इसके पीछे?

किसान-आंदोलन के साथ-साथ पर्यावरण और मानवाधिकारवादियों की आड़ में ऐसे समूह भी सामने आए हैं, जिनकी भूमिका संदिग्ध है। ‘टूलकिट’ को लेकर तमाम बातें हैं, पर कोई दावे के साथ नहीं कह सकता कि देश-विरोधी साजिशों में ऐसी गतिविधियों की भूमिका नहीं है। किसी न किसी रूप में असंतोष को भड़काना और फिर उसका लाभ उठाना। किसकी दिलचस्पी है, इन बातों में?

हाल में ताइवान को लेकर भारतीय-मीडिया की कुछ रिपोर्टों से नाराज होकर चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स की 6 अप्रेल, 2021 की टिप्पणी में कहा गया कि, हम सिक्किम को भारत का हिस्सा मानने से इनकार कर देंगे। पूर्वोत्तर के अलगाववादी समूहों का समर्थन भी कर सकते हैं।

मणिपुर और नगालैंड के चरमपंथी संगठनों को चीन से हथियार मिलते हैं और  ट्रेनिंग भी। उल्फा कमांडर परेश बरुआ और नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नगालैंड (आईएम) के फुंतिंग शिमरांग को चीन ने अपने यहाँ शरण दी है, जो म्यांमार से लगी सीमा पर चीन के युन्नान प्रांत में रहते हैं।

कश्मीर में हिंसा भड़काने के लिए आईएसआई ने जैशे-मोहम्मद, लश्करे-तैयबा और हिज्ब-उल-मुजाहिदीन जैसे संगठनों को हथियार और ट्रेनिंग देने का काम किया है, वहीं पूर्वोत्तर में भी उसने इस्लामिक संगठन खड़े किए हैं। इनमें मुस्लिम युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम, मुस्लिम युनाइटेड टाइगर्स ऑफ असम, इस्लामिक लिबरेशन आर्मी ऑफ असम, हरकत-उल-मुजाहिदीन और हरकत-उल-जिहाद जैसे तमाम संगठन शामिल हैं।

नब्बे के दशक में ढाका स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग ने उल्फा और नगा समूहों के साथ संपर्क स्थापित कर लिए थे। बांग्लादेश अब भारत से सहयोग करता है, पर वहाँ पाकिस्तान-परस्त कट्टरपंथी समूह सक्रिय हैं। वे अपनी सरकार और भारत सरकार दोनों के खिलाफ काम कर रहे हैं। मार्च में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान जमात-ए-इस्लामी ने वहाँ जबर्दस्त हिंसा की थी। हाल में दुर्गा-पूजा के समय मंदिरों पर हमले हुए। यह सब उसी योजना का हिस्सा है।

धन-बल और छल

चीन धन-बल और छल-बल का सहारा लेता है। दूसरे देशों में चीन केवल पूँजी निवेश ही नहीं करता, राजनीति में हस्तक्षेप भी करता है। श्रीलंका, मालदीव, पाकिस्तान और नेपाल इसके उदाहरण हैं। सेशेल्स में भारतीय सैनिक अड्डे की स्थापना के विरोध में वहाँ के विरोधी दलों ने अभियान चलाया, जो चीन से प्रेरित था। चीन ने हिंद महासागर के देशों में अपना प्रभाव बढ़ाया है।

नेपाल में पिछले साल जब केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री थे, तब चीन की राजदूत साफ-साफ वहाँ की राजनीति में हस्तक्षेप कर रही थीं। एशिया और अफ्रीका के राजनीतिक दलों के साथ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने सीधे संबंध बनाए हैं। वे ट्रेनिंग प्रोग्राम और कार्यशालाएं चलाते हैं। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता भी इसमें शामिल होते हैं। अफ्रीकी देशों में चीन के पत्रकार प्रशिक्षण कार्यक्रम चलते हैं। उनके पत्रकार चीन यात्रा पर जाते हैं।

अमेरिकी थिंकटैंक कौंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस की विशेषज्ञ एलिसा आयर्स ने लिखा कि चीनी प्रभाव को रोकना है, तो उसके पूँजी निवेश पर नजर रखनी चाहिए। अमेरिकी थिंक टैंक ब्रुकिंग्स की एक रिपोर्ट के अनुसार सन 2012 में शी चिनफिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद से उसकी वैश्विक महत्वाकांक्षा ने नया रूप धारण किया है। कम्युनिस्ट पार्टी ने पूँजी और सूचना माध्यमों को अपना हथियार बनाया है। चीन छिपकर और गहराई से व्यवस्था में घुसपैठ करता है। जर्मन थिंक टैंक मैरिक्स (मर्केटर इंस्टीट्यूट ऑव चायना स्टडीज़ और जीपीपीआई (ग्लोबल पब्लिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट) की एक रिपोर्ट के अनुसार चीन का तरीका राष्ट्रीय नीतियों से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं, संस्थानों, व्यक्तियों और नेताओं को प्रभावित करने का होता है।

रिपोर्ट में अमेरिकी सीनेटर स्टीव डेंस और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व सीनेटर सैम डैस्टायरी का उल्लेख किया, जिन्हें चीनी दानदाताओं ने पैसा दिया। इस रिपोर्ट के अनुसार चीन ने पत्रकारीय सूचना को तोड़ने-मरोड़ने पर काफी पैसा लगाया है। वक्त जरूरत दबे हुए देशों से राजनीतिक समर्थन हासिल किया। रुकावट बनने वालों के अपहरणों, प्रताड़नाओं और देश-निकाले का सहारा भी लिया गया। वह हर कीमत पर अपना दबदबा चाहता है।

चीन का सर्विलांस सिस्टम अपने देश में तो काम करता है, विदेश में भी उसका विस्तार हो रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार 18 देशों में आर्थिक समझौतों की आड़ में उसकी दूरसंचार कंपनियों का जाल स्थापित हो गया है। इनमें  जिम्बाब्वे, उज्बेकिस्तान, पाकिस्तान, केन्या और यूएई जैसे देश शामिल हैं। थाईलैंड भी इनमें शामिल है। इथोपिया का पूरा नेटवर्क अब चीन के पास है।

विश्वविद्यालयों में पैठ

अमेरिकी विश्वविद्यालयों को मिलने वाले चीनी दान और तोहफों की संख्या बढ़ती जा रही है। सन 2013 से पिछले साल तक करीब एक अरब डॉलर के तोहफे इन शिक्षा संस्थानों को मिल चुके थे। अमेरिका के 115 कॉलेजों को चीन ने पैसा दिया है। इनमें सबसे ज्यादा पैसा हारवर्ड विवि को 9.37 करोड़ डॉलर (करीब 650 करोड़ रुपये) मिला। सदर्न कैलिफोर्निया विवि और पेंसिल्वेनिया विवि का स्थान दूसरा और तीसरा रहा। यह मामला तब ज्यादा उछला जब हारवर्ड विवि के केमिस्ट्री के एक प्रोफेसर साहब चीन से मिले पैसे का विवरण छिपाने के आरोप में गिरफ्तार किए गए।

विश्वविद्यालयों को दान मिलने में हैरत की बात नहीं है, पर विश्वविद्यालय से जुड़े बौद्धिक वर्ग की राजनीतिक भूमिका को लेकर संशय होता ही है। शिक्षा और शोध के राजनीतिक निहितार्थ के अलावा बौद्धिक संपदा की चोरी के भी अनेक प्रकरण हैं। यहाँ तक कि कोविड-19 के वायरस को भी की बौद्धिक संपदा की चोरी के साथ जोड़ा गया है। चीन के पास जो उच्चस्तरीय तकनीक है, उसमें से काफी या तो चोरी की है या रिवर्स इंजीनियरिंग की देन है।

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तस्‍वीर स्‍त्रोत : सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, हैदराबाद की वेबसाइट।


लेखक
प्रमोद जोशी ने लखनऊ विवि से 1973 में एमए राजनीति शास्त्र किया और दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया पर विशेषज्ञता रखते हैं। भारतीय विदेश-नीति और भू-राजनीति पर व्यापक रूप से लेखन के साथ ही भारतीय रक्षा-नीति, साइबर सुरक्षा और हिन्द महासागर क्षेत्र के सामरिक महत्व पर लेखन करते हैं। लगभग 48 वर्ष से हिन्दी पत्रकारिता में लखनऊ के स्वतंत्र भारत से सन 1973 में शुरुआत की और उसके बाद नवभारत टाइम्स, सहारा टेलीविजन और हिन्दुस्तान, दिल्ली में काम किया। वर्तमान में सम्प्रति रक्षा, विदेशी-नीति, नागरिक उड्डयन तथा आंतरिक सुरक्षा जैसे विषयों पर केंद्रित पत्रिका ‘डिफेंस मॉनिटर’ के प्रधान सम्पादक के रूप में कार्यरत हैं।  

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POST COMMENTS (1)

anshuman chaturvedi

नवम्बर 26, 2021
great insight

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