• 10 August, 2022
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यूरोप में मंडराते युद्ध के बादल: यूक्रेन पर नाटो-रूस गतिरोध

लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त)
सोम, 31 जनवरी 2022   |   7 मिनट में पढ़ें

अभी हाल ही में रूस ने मनोवैज्ञानिक युद्ध का एक अच्छा लेकिन बहुत पुराना तरीका आजमाया। इसने व्यापक रूप से प्रचारित किया कि भारी संख्या में सैनिकों को ‘युद्ध के मोर्चे’ पर भेजा जा रहा है। अगर यह यूक्रेन पर आक्रमण करने का फैसला करता तो बड़े पैमाने पर हताहत होते। यह एक जोरदार संदेश था कि रूस युद्ध की तैयारी कर रहा है, यदि उसके द्वारा निर्धारित की गयी लक्ष्मण रेखा नाटो ने भंग की तो भारी रक्तपात होता।

2014 के बाद से, जब रूस ने देखा कि पूर्व सोवियत गणराज्यों और वारसॉ संधि वाले देशों को अपने पाले में लेने के लिए नाटो अथक प्रयास कर रहा है, तो उसने निर्णय लिया कि अब बहुत हो चुका, उसने यूक्रेन और नाटो के खिलाफ सबसे शक्तिशाली हाइब्रिड युद्धों में से एक को अपनाया। अब रूस अपने शक्तिशाली नेता व्लादिमीर पुतिन के नेतृत्व में पश्चिमी सैन्य गठबंधन पर दबाव बना रहे हैं कि या तो वे अपने कदम पीछे हटायें या युद्ध का सामना करें।

यह सर्वविदित है कि मतभेदों को सुलझाने के लिए पारंपरिक युद्ध का तरीका उचित नहीं होता और यूरोप की उभरती स्थिति में भी इस कहावत के गलत साबित होने की संभावना नहीं है। यह संभावित विनाशकारी स्थिति किस ओर रुख कर सकती है? इसके बारे में जानने के लिए इसकी पृष्ठभूमि को संक्षिप्त रूप से जानना उपयोगी हो सकता है।

एक बात सही है कि सबसे परिपक्व राष्ट्र भी कभी भी अच्छी तरह नहीं समझ पाते कि युद्ध में जीत के बाद पराजित विरोधी को दंडित करने के लिए उन्हें क्या-क्या करना चाहिए। 1919 की वर्साइल्स संधि को ही लीजिए, मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी को कैसे निशाना बनाया और व्यवहार किया, जिसके फलस्वरूप जर्मन राष्ट्रवाद का पुनर्जन्म और हिटलर का उदय हुआ। ठीक ऐसा ही 1989 में हुआ था जब शीत युद्ध समाप्त हुआ और सोवियत संघ बिखरने लगा। प्रक्रिया अभी तक शांतिपूर्ण थी और उतनी उथल-पुथल नहीं थी जितनी हो सकती थी।

पूर्व सोवियत संघ (एफएसयू) के 15 गणराज्यों के पुनर्गठन के रूप में वारसॉ संधि का पुनर्मूल्यांकन और पुनर्गठन जरूरी था। नाटो को आशंका थी कि रूस का भविष्य में पुनरुत्थान हो सकता था। भविष्य की आशंका के मद्देनजर नाटो अधिक से अधिक गणराज्यों को अपने साथ मिलाना चाहता था। कम से कम दस पूर्व गणराज्य और पूर्वी यूरोपीय राष्ट्र नाटो में शामिल हो गए।

Ukrainian service members hold drills in the Kherson region

रूस इसे रोकने की स्थिति में नहीं था क्योंकि इसका समग्र प्रभाव और अर्थव्यवस्था काफी कमजोर हो गई थी, हालांकि अधिकांश अंतरराष्ट्रीय स्थिति में यह उच्च तालिकाओं में बना रहा। जब यूक्रेन ने 2014 में यूरोपीय संघ में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की और उसके नेता विक्टर यानुकोविच ने लोकप्रिय मांग का विरोध करने का प्रयास किया तो स्थिति बिगड़ने लगी।

तब तक रूस ने अपनी कुछ शक्ति वापस पा ली थी; यह यूरोप के लिए एक प्रमुख ऊर्जा प्रदाता था और इसके रक्षा उद्योग ने जोरदार वापसी की थी। इसने 2008 में अपने पूर्व गणराज्यों में से एक, जॉर्जिया के इस तरह के सभी प्रयासों को विफल कर दिया था।

दो दशकों से सत्ता में रहे राष्ट्रपति पुतिन एक मजबूत नेता हैं। वह महसूस करते हैं कि रूस अपनी पूर्व महाशक्ति का दर्जा हासिल नहीं कर सकता, लेकिन फिर भी नाटो द्वारा उसे दूसरे दर्जे की शक्ति के रूप में नहीं माना जा सकता। रूस की सैन्य क्षमता नाटो और यूरोप का भारी नुकसान कर सकती हैं। पुतिन रूस के ‘निकटवर्ती विदेश’ क्षेत्रों में पश्चिम के प्रभुत्व को विफल करने की आवश्यकता को समझते हैं। वह वांछित लाभ प्राप्त करने के लिए सैन्य शक्ति का उपयोग करने या धमकी देने में भी विश्वास करते हैं।

2014 के बाद से रूस ने यह सुनिश्चित किया कि यूक्रेन में अशांति बनी रहे क्योंकि क्रीमिया पर कब्जा कर लिया गया था। यदि रूस को क्रीमिया के बंदरगाह शहर सेवस्तोपोल से अलग कर दिया गया होता, तो रूस का काला सागर स्थित बेड़ा निष्क्रिय हो जाता और इस प्रकार भूमध्य सागर में उसकी शक्ति बेअसर हो जाती। यदि रूस अपनी शेष और भविष्य की शक्ति को बरकरार रखना चाहता है तो क्रीमिया प्रायद्वीप और सेवस्तोपोल के बंदरगाह को सुरक्षित करना अनिवार्य था।

कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के अनुसार – “मास्को काला सागर क्षेत्र को अपनी भू-आर्थिक रणनीति के लिए महत्वपूर्ण मानता है। भूमध्यसागरीय क्षेत्र में रूसी शक्ति और प्रभाव को बरकरार रखने के लिए, प्रमुख यूरोपीय बाजारों के साथ अपने आर्थिक और व्यापारिक संबंधों की रक्षा करना, और दक्षिणी यूरोप को रूसी तेल और गैस पर अधिक निर्भर बनाना उसकी रणनीति है”। अगर उसने 2014 में ऐसा नहीं किया होता, तो नाटो यूक्रेन के जरिये सेवस्तोपोल तक रूसी पहुंच को रोकने का प्रयास कर सकता था। रूस उसमें से किसी को भी दोहराने देना नहीं चाहता और उसने यूक्रेन के जातीय रूसी क्वार्टर में सक्रिय रूप से अलगाववाद का समर्थन करने के लिए अपने हाइब्रिड युद्ध का विस्तार किया है। इसने अपने इरादे को काफी स्पष्ट कर दिया है कि यूक्रेन नाटो के लिए लक्ष्मण रेखा है। यूक्रेन की राजनीति, सेना, अर्थव्यवस्था, सामाजिक ताने-बाने और सूचना के क्षेत्र पर हमलों ने इस खेल को जीवित रखा है। रूस ने औपचारिक रूप से 18 मार्च 2014 को क्रीमिया पर कब्जा कर लिया, क्रीमिया गणराज्य और सेवस्तोपोल के संघीय शहर को रूस के 84 वें और 85 वें संघीय राज्यों के रूप में शामिल किया गया।

पुतिन ने 2022 की शुरुआत में बेलारूस के साथ उत्तरी और पूर्वी सीमाओं पर 120,000 सैनिकों और 1200 से अधिक टैंकों की तैनाती के बाद अब फिर से क्यों यूक्रेन पर दबाव डालने का फैसला किया है? वह क्रीमिया पर कब्जा करने और 2014 में डोनबास में हस्तक्षेप की तुलना में यूक्रेन पर कहीं अधिक व्यापक आक्रमण की धमकी क्यों दे रहा है? पुतिन बस उत्तरोत्तर विकसित हो रही यूरोपीय व्यवस्था से परेशान हैं जो रूसी शक्ति को गंभीर रूप से कमजोर कर रही है और नाटो द्वारा पूर्व की ओर विस्तार करने के प्रयासों को त्यागने के रूस के अनुरोधों का पालन करने से बार-बार इनकार किया जा रहा है। अन्य कारण भी हो सकते हैं।

नाटो का नेतृत्व कभी भी कमजोर नहीं रहा है और इसके यूरोपीय मुख्य आधार में से एक जर्मनी के पास एक नया और अस्थिर नेतृत्व भी है। एक उभरती हुई महामारी के बाद की नई विश्व व्यवस्था, अमेरिका में संभवत: एक कार्यकाल का राष्ट्रपति, ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन में भी उतना लोकप्रिय प्रधान मंत्री नहीं, अमेरिका की इंडो पैसिफिक की ओर ध्यान केंद्रित करने की इच्छा, और महामारी के बाद के समय में काफी हद तक कमजोर अर्थव्यवस्थाएं, सभी ऐसी स्थिति के लिए तैयार नहीं हैं, जिसके कारण रूसी खतरों को और अधिक गंभीर माना जा रहा है। पुतिन का लक्ष्य स्पष्ट है; सोवियत पतन के परिणामों को उलटना, नाटो को विभाजित करना और शीत युद्ध को समाप्त करने वाले भू-रणनीतिक समझौते पर फिर से बातचीत करना। इसमें सत्ताधारी सत्तावादी शासनों का बचाव करना और लोकतंत्रों को कमजोर करना शामिल है।

Russian mechanized infantry holds drills in the Rostov region

नाटो स्पष्ट रूप से परिस्थितियों पर नजर रखे हुए है लेकिन अगर युद्ध होता तो उसके पास समय पर लामबंद करने की इच्छाशक्ति या क्षमता नहीं होती, हालांकि हर समय एक उचित ताकत तैनात रहती है। याद रखने की जरूरत है कि शीत युद्ध के दिनों का नाटो युद्ध सिद्धांत परमाणु निरोध पर अधिक और युद्ध लड़ने पर कम था। क्या रूस अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए युद्ध की रणनीति अपना सकता है?

पूर्व के सोवियत संघ ने तीन बार रूबिकॉन को पार करने की इच्छा का प्रदर्शन किया; 1956 में हंगरी के खिलाफ, 1968 में चेकोस्लोवाकिया के खिलाफ और 1979 में अफगानिस्तान के खिलाफ। तथ्य यह है कि चीन रूस का समर्थन कर रहा है, जो रूसी आत्मविश्वास को बढ़ा सकता है और अंतरराष्ट्रीय चिंता का कारण हो सकता है। ऐसी अटकलें हैं कि चीन अमेरिका और पश्चिम की प्रतिक्रिया और संकट से निपटने की क्षमता को विभाजित करने के लिए यूक्रेन में रूस के साथ तालमेल बिठाने के लिए ताइवान पर आक्रमण कर सकता है जो कि 20वीं और 21वीं सदी में देखी गई किसी भी घटना से बड़ी होगी।

रूस भी अपने सहयोगी बेलारूस को मिसाइल सिस्टम से लैस कर रहा है और अधिक जहाजों को काला सागर में स्थानांतरित कर दिया है। युद्ध विनाशकारी होगा, खासकर अगर यह हाइपरसोनिक हथियारों का सहारा लेकर, उपग्रहों को मार गिराने और अत्यधिक साइबर युद्ध के साथ लड़ा गया। इन सबका प्रभाव शायद ही स्थानीय स्तर का हो।

नाटो देशों ने रूस और पुतिन को ‘गंभीर परिणाम’ की चेतावनी दी है, लेकिन यह भी ज्ञात है कि नाटो में शामिल होने वाले कई नए सदस्य रूस के खिलाफ सक्रिय या जिम्मेदारी पूर्वक समर्थन करने के इच्छुक नहीं हो सकते। इस प्रकार रूस की मंशा पहले ही आधी हल हो जाएगी। नाटो के यूरोपीय देशों को अपनी ऊर्जा जरूरतों को भी याद रखना होगा। रूस आमतौर पर यूरोप की गैस जरूरतों का लगभग एक तिहाई आपूर्ति करता है। चूंकि ब्रिटिश और यूरोपीय गैस बाजार जुड़े हुए हैं, ऐसे में यूरोप में किसी भी व्यवधान का ब्रिटेन में आपूर्ति और कीमतों पर असर पड़ेगा। यूरोप के कुछ छोटे देश विशेष रूप से उत्तरी मैसेडोनिया, बोस्निया और हर्जेगोविना और मोल्दोवा रूसी गैस पर निर्भर हैं। सर्बिया, फ़िनलैंड और लातविया की भी रूस पर गैस आपूर्ति की निर्भरता 90 प्रतिशत है। रूस को भी इस पैसे की जरूरत है; अतः यह एकतरफा सामरिक आवश्यकता नहीं है।

यदि यूरोप में पुराने और अधिक पारंपरिक रूपों में युद्ध होता है, तो हम हजारों शरणार्थियों की उम्मीद कर सकते हैं, सीरियाई या उत्तरी अफ्रीकी संकट, भारी हताहत, एक खंडित यूक्रेन और बहुत अस्थिर महाद्वीप देखने को मिल सकता है। लेकिन क्या नाटो रूस को परेशान करने वाले नए तरीकों को हासिल करने के अपने प्रयासों पर भरोसा करेगा और उस पर अंकुश लगा पाएगा। नाटो के इरादे या रणनीति में कुछ भी निरंकुश नहीं है और इसे धीमा किया जा सकता है और बिना प्रतिष्ठा के नुकसान के रूसी भावनाओं को शांत करने के लिए मनाया जा सकता है।

दुनिया को जिस चीज से सावधान रहना चाहिए, वह है लाभ लेने वाले बाहरी देश, जिनमें से प्रमुख चीन है। इस तरह के संभावित युद्ध से चीन से ज्यादा किसी को फायदा नहीं होगा। यह रूसियों को इस पर निर्भर बना देगा और चीन को इंडो पैसिफिक में रोकने के अमेरिका की सभी योजनाओं पर पानी फेर देगा। नाटो को रूसियों को सही निर्णय लेने में मदद करनी चाहिए; और सही फैसला है- युद्ध नहीं करना, क्योंकि इससे शांति भंग हो सकती है। यह एक ऐसी चीज है जिसका भारत काफी अभ्यस्त हैं।

इस सब में भारत के लिए क्या है? समस्या चुनने की है; यदि यह जारी रहा तो हम गतिरोध के समय किसका समर्थन करेंगे। 2014 में रूसियों ने भारत को धन्यवाद दिया था, हालांकि भारत केवल चुप रहा था। हालाँकि, अमेरिका और नाटो अपने रुख के लिए निश्चित तौर पर भारतीय समर्थन की कामना करेंगे। ऐसी परिस्थितियों में मौन रहना एक कठिन प्रस्ताव है और शांति की कामना करना और उसके लिए आग्रह करना ही बेहतर भारतीय नीति होगी। वास्तव में, स्थिति को संभालने के लिए एक निष्पक्ष राजनयिक पहल करना ही बेहतर हो सकता है।

भारत के पास शांतिदूत की भूमिका निभाने की क्षमता है और ऐसा करने के लिए यह एक अच्छा अवसर है। भारत कभी नहीं चाहता कि भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को उत्तरोत्तर मजबूत करने वाली अपनी पकड़ खो दे। साथ ही वह रूस को चीन के ज्यादा करीब भी देखना नहीं चाहता क्योंकि उससे चीन को उत्तरी सीमाओं पर भारत के खिलाफ अपनी आक्रामक रणनीति जारी रखने में मदद मिलेगी।

पूरी संभावना है कि यह संकट खत्म हो जाएगा। लेकिन पुतिन और रूस ने यह अवधारणा बना ली है कि रूसी हितों को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में अपनी सारी कमजोरियों के बावजूद रूस दुनिया की रणनीति का एक प्रमुख खिलाड़ी बना हुआ है।

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लेखक
लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त), पीवीएसएम, यूवाईएसएम, एवीएसएम, एसएम, वीएसएम, भारतीय सेना के श्रीनगर कोर के पूर्व कमांडर रहे हैं। वह रेडिकल इस्लाम के इर्द-गिर्द घूमने वाले मुद्दों पर विशेष जोर देने के साथ एशिया और मध्य पूर्व में अंतर-राष्ट्रीय और आंतरिक संघर्षों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वह कश्मीर केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं और रणनीतिक मामलों और नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमने वाले विविध विषयों पर भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में बड़े पैमाने पर बोलते हैं।

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