• 25 June, 2022
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सीडीएस की नियुक्ति में हिचकिचाहट क्‍यों!

मेजर जनरल हर्ष कक्कड़ (रि॰)
शुक्र, 28 जनवरी 2022   |   4 मिनट में पढ़ें

देश के पहले रक्षा प्रमुख (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत की 08 दिसंबर 2021 को हेलीकॉप्टर दुर्घटना में हुई दुखद मृत्यु ने उन सुधारों को धीमा कर दिया, जो सशस्त्र बलों में हो रहे थे। सीडीएस के रूप में जनरल रावत ने स्वतंत्रता के बाद से सशस्त्र बलों द्वारा किए जा रहे सबसे बड़े पुनर्गठन थिएटर कमांड को लागू करने के लिए अपनाए जा रहे कार्यों के बारे में हर सार्वजनिक संबोधन में देश को अवगत कराया था। कई लोगों के विपरीत विचारों के बावजूद वह इन सुधारों को आगे बढ़ा रहे थे, क्योंकि उनका मानना ​​​​था कि राष्ट्र को भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए इनकी जरूरत है । जनरल रावत अपने कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए एक बेहतरीन स्थिति में थे क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व को उन पर और उनकी क्षमता पर पूरा भरोसा था।

रक्षा मंत्रालय में सैन्य मामलों के विभाग (डीएमए) के प्रमुख के रूप में, उन्होंने सेवा विशिष्ट मुद्दों को नौकरशाही नियंत्रण से दूर करना शुरू कर दिया था, जिसकी बहुत आवश्यकता थी। डीएमए ने मौजूदा नौकरशाही प्रक्रियाओं को बदल दिया था जो दशकों से प्रचलन में थीं और जिसने सशस्त्र बलों को निराश करने का काम किया था। रक्षा सचिव के अधीन काम करनेवाला एक अतिरिक्त सचिव वर्तमान में उनके पद को संभाल रहा है। यह सबसे खराब काम है, जो सरकार इस संदर्भ में कर सकती है, क्योंकि यह इन सुधारों को पीछे कर देगी। सरकार द्वारा उनके उत्तराधिकारी की नियुक्ति में जितना अधिक समय लगेगा, व्यवस्था उतनी ही खराब होगी।

उनके प्रतिस्थापन की घोषणा में देरी के परिणामस्वरूप सेना प्रमुख को सीडीएस के रूप में कार्य करने वाला सबसे वरिष्ठ सेवा प्रमुख बना दिया गया है। रिक्त पद को भरने वाली यह अस्थायी व्यवस्था अप्रभावी है। सीडीएस के रूप में स्थायी अध्यक्ष की अनुपस्थिति में संयुक्त मामलों पर निर्णय लेने वाली चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी (सीओएससी),  बलों के बीच असहमति को दूर करने के लिए विवादास्पद मुद्दों की अनदेखी करेगी।

जनरल रावत आपत्तियों के बावजूद, थिएटर कमांड बनाने के सरकार के एजेंडे को लागू करने के लिए सीओएससी  पर दबाव डाल रहे थे। प्रक्रिया में सुधार के लिए जो अध्ययन शुरू किए गए थे, वह जारी रह सकते हैं, लेकिन असहमति को आगे बढ़ाने, निगरानी करने और हल करने के लिए कोई सीडीएस नहीं होने से प्रक्रिया की गति कम हो जाती है। जो सुधार आगे बढ़ने की प्रक्रिया में थे वे ठप हो सकते हैं।

सीमित बजट के युग में जो केंद्रीय क्षमता निर्माण प्रक्रिया आवश्यक है,  उसे भी स्थायी अध्यक्ष के बिना नुकसान होगा, सीओएससी प्राथमिकताओं पर निर्णय लेने में असमर्थ होगी, क्योंकि क्षमता वृद्धि पर प्रत्येक सेना के अपने विचार और धारणाएं होती हैं। यह फिर उस युग में चला जाएगा जब नौकरशाहों द्वारा सैन्य मामलों के बारे में कोई जानकारी नहीं होने के कारण सेनाओं की मांगों को संकलित और निर्णय लेने के लिए रक्षा मंत्रालय को पेश किया जाता था। एक नया सीडीएस नियुक्त करने में जितना अधिक विलंब होगा, उतना ही सिस्टम पूर्व-सीडीएस अवधि में चलता जाएगा।

यह भी कहा गया है कि सीडीएस की कोई परिचालन भूमिका नहीं है और इसलिए नियुक्ति में देरी स्वीकार्य है। इससे अधिक अतार्किक बात कोई और नहीं हो सकती। भारत-चीन गतिरोध के चरम पर लद्दाख में निगरानी और पूर्व चेतावनी के लिए नौसेना की हवाई संपत्तियों को भेजना सीडीएस के सीधे हस्तक्षेप का ही परिणाम था। जरूरत पड़ने पर नौसेना के मिग 29 लड़ाकू विमानों को भी शामिल करने के लिए तैयार किया गया था। संकट के समय में सेनाओं के बीच समन्वय की जिम्मेदारी सीडीएस की होती है। एकल बिंदु सैन्य सलाहकार के रूप में, वे राजनीतिक सत्ता के साथ लगातार संपर्क में थे और अधिकांश निर्णयों और घोषणाओं के लिए जिम्मेदार थे। किसी के शीर्ष पर नहीं होने से, सभी सेवाओं के संसाधनों का समन्वय और उपयोग करने में समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। सीडीएस की नियुक्ति में देरी सशस्त्र बलों को कई तरह से प्रभावित करेगी।

ऐसी चर्चा थीं कि सरकार के पास अगले सीडीएस की नियुक्ति के लिए व्यापक विकल्प हैं, जिनमें हाल ही में सेवानिवृत्त हुए अधिकारी भी शामिल हैं। यह गलत है क्योंकि एक बार सेवानिवृत्त होने के बाद कानूनी आधारों के बिना किसी व्यक्ति को बहाल नहीं किया जा सकता। सीडीएस को सशस्त्र बलों का एक सेवारत सदस्य होना चाहिए और राष्ट्रीय एजेंडा को आगे बढ़ाने में सक्षम होने के लिए सेवा में सबसे वरिष्ठ होना चाहिए। चयन के विकल्प के लिए वर्तमान सेवारत सेना प्रमुखों पर ही विचार किया जाना चाहिए। इन्हें वर्तमान सरकार द्वारा उचित विचार-विमर्श के बाद नियुक्त किया गया है, और इसलिए सीडीएस में उनकी पदोन्नति में कोई देरी नहीं हो सकती। सीडीएस की नियुक्ति की पुष्टि भी केवल दो व्यक्तियों पर निर्भर करती है, जो कैबिनेट की नियुक्ति समिति बनाते हैं, प्रधान मंत्री और गृह मंत्री। इसलिए, अगले सीडीएस की घोषणा करने के लिए कोई कानूनी बाध्यता नहीं होने के बावजूद, देरी चिंताजनक है।

ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार अगले रक्षा प्रमुख के रूप में सही व्यक्ति की प्रतीक्षा करने के इरादे से घोषणा को रोक रही है। किसी वरिष्ठ को दरकिनार किए बिना या सशस्त्र बलों के राजनीतिकरण किये जाने की आलोचना को दरकिनार करने के लिए सरकार ऐसा कर सकती है क्योंकि पूर्व में ऐसा हुआ है। जब जनरल बिपिन रावत को उनके दो वरिष्ठ अधिकारियों के स्थान पर सेना प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया था, तो राजनीतिकरण के आरोप लगे थे। साथ ही एनएसए, अजीत डोभाल के साथ जनरल बिपिन रावत की निकटता को भी बताया गया था। चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में सरकार किसी भी विवाद में पड़ना नहीं चाहेगी।

सरकारी हलकों में चर्चा है कि सीडीएस की नियुक्ति के लिए सेना प्रमुख सबसे आगे चल रहे हैं। यह सच होने की स्थिति में, सरकार संभवत: किसी विशिष्ट व्यक्ति के अगले रक्षा प्रमुख के रूप में स्थान पाने की प्रतीक्षा कर रही होगी। यदि सरकार की यही मंशा है, तो इसके लिए अगले महीने सीडीएस की कोई घोषणा किए जाने की संभावना नहीं है। इसके फलस्वरूप सुधार कार्य पीछे हो सकते हैं, जबकि रक्षा मंत्री ने दावा किया था कि सुधार कार्य तय कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ेगा।

इसमें कोई शक नहीं है कि जनरल बिपिन रावत द्वारा शुरू किए गए सुधार कार्यों का अंत नहीं होगा। लेकिन उनके स्थान पर किसी के चयन की घोषणा में देरी से उनके द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं में विलंब की भरपाई हो पाएगी। उनके द्वारा शुरू अध्ययनों और परियोजनाओं के धीमा पड़ने पर यह संदेश जाएगा कि सरकार थिएटर कमांड बनाने की अपनी इच्छा के प्रति ईमानदारी नहीं बरत रही है। इससे यह भी संदेश जायेगा कि सरकार सीडीएस की नियुक्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण नहीं मानती।

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लेखक
मेजर जनरल हर्ष कक्कड़, रक्षा प्रबंधन कॉलेज, सिकंदराबाद में सामरिक अध्ययन विभाग के प्रमुख थे।
वह टोरंटो में कैनेडियन फोर्स कॉलेज में राष्ट्रीय सुरक्षा अध्ययन पाठ्यक्रम के पूर्व छात्र हैं। जनरल कक्कड़ 
बड़े पैमाने पर समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और ऑनलाइन न्यूज़लेटर्स के लिए लिखते हैं। उनके लेखों में 
अंतरराष्ट्रीय संबंधों, रणनीतिक खतरों (दक्षिण एशिया पर जोर देने के साथ सैन्य और गैर-सैन्य दोनों), 
रक्षा योजना और क्षमता निर्माण, राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक-सैन्य सहयोग शामिल हैं।

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