• 16 May, 2022
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कश्मीर के समर्थन में पाकिस्तानी कैलेंडर के कई दिवस निर्धारित

मेजर जनरल हर्ष कक्कड़ (रि॰)
बुध, 12 जनवरी 2022   |   4 मिनट में पढ़ें

पाकिस्तान हर साल 05 जनवरी को ‘आत्मनिर्णय का अधिकार’ दिवस के रूप में मनाया करता है। यह 1949 का वह दिन था जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने जम्मू और कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में जनमत संग्रह कराने के लिए प्रतिबद्धता दिखायी थी। इमरान खान ने इस साल 05 जनवरी को ट्वीट किया, ‘कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में जनमत संग्रह की यूएनएससी की प्रतिबद्धता अधूरी है। हिंदुत्व मोदी सरकार ने यूएनएससी के प्रस्तावों, अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानूनों और चौथे जिनेवा कन्वेंशन सहित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का खुलेआम उल्लंघन किया है; और जम्मू और कश्मीर की स्थिति और जनसांख्यिकी को बदलने की मांग करके युद्ध अपराध किया है। जम्मू और कश्मीर पर संकल्प संख्या 47 को 21 अप्रैल 1948 को यूएनएससी द्वारा अपनाया गया था।

पाकिस्तान यह भूल गया है कि संकल्प के चरणों का पालन करने से इनकार करने से यह शून्य हो गया है। यह इस तथ्य की भी अनदेखी करता है कि शिमला समझौते और लाहौर घोषणा ने यूएनएससी के प्रस्ताव को दरकिनार कर दिया है और कश्मीर मुद्दे को किसी भी वैश्विक शक्ति या संगठन द्वारा मध्यस्थता को रास्ते से हटाकर द्विपक्षीय बना दिया है। 05 जनवरी उन दिनों में से एक है जब पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को वैश्विक सुर्खियों में रखने की उम्मीद कर रहा है। कई अन्य भी हैं।

हर साल 05 फरवरी को कश्मीर के साथ एकजुटता की वर्षगांठ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन का कोई विशेष महत्व नहीं है। इसे 1990 में नवाज शरीफ द्वारा तय किया गया था और तब से यह प्रचलन में है। यह एक राष्ट्रीय अवकाश भी है। पाकिस्तान में इसे ‘यूम-ए-यखजेहती-ए-कश्मीर’ कहा जाता है और सुबह 10 बजे एक मिनट का मौन रखा जाता है। इस दिन, पाकिस्तान में रैलियों का आयोजन होता है जबकि उसके राजनेता कश्मीरियों के साथ एकजुटता प्रदर्शित करते हुए भारत विरोधी बयान देते हैं। मूल विषय घाटी में जनमत संग्रह और मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुद्दे को उठाना है। खुद द्वारा आतंकवाद के समर्थन का कोई उल्लेख नहीं होता जो प्रतिदिन निर्दोष कश्मीरियों को अपना शिकार बनाता है।

पाकिस्तान में 05 अगस्त को भी चिह्नित किया गया है, जिस दिन भारत ने धारा 370 को हटा दिया था। इसे ‘यूम-ए-इस्तेहसाल’ (शोषण का दिन) के रूप में मनाया जाता है। धारा 370 को निरस्त करने के भारतीय निर्णय ने पाकिस्तान को झकझोर दिया और उसके पास भारत के खिलाफ निराशा और गुस्से को प्रदर्शन करने के लिए अपने कैलेंडर में एक और दिन चिह्नित करने के अलावा कोई जवाब नहीं था। इमरान खान ने पिछले साल 05 अगस्त को कहा था, ‘इन दो वर्षों में, दुनिया ने अभूतपूर्व उत्पीड़न देखा है।’ 2019 में, इमरान ने धारा को निरस्त करने के भारतीय फैसले के खिलाफ हर शुक्रवार को आधे घंटे विरोध प्रदर्शन का आदेश दिया था। उन्हें पहले शुक्रवार के बाद ही उस आह्वान को रद्द करने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि मजबूर सरकारी कर्मचारियों के अलावा कोई उसका समर्थक नहीं था।

2019 में, जिस वर्ष भारत ने अनुच्छेद 370 को निरस्त किया, पाकिस्तान ने निर्णय का विरोध करने के लिए भारतीय स्वतंत्रता दिवस, 15 अगस्त को काला दिवस घोषित किया था। इमरान ने यहां तक जोर देकर कहा कि भारत के साथ किसी भी बातचीत के लिए मूल शर्त अनुच्छेद 370 की बहाली होगी। पाकिस्तान को दो वर्षों से अनुच्छेद 370 की बहाली के लिए उसके आह्वान का कोई समर्थन नहीं मिला है।

पाकिस्तान 13 जुलाई को कश्मीर शहीद दिवस के रूप में चिह्नित करता है, जो 1931 में राज्य बलों द्वारा मारे गए 21 प्रदर्शनकारियों की याद में है। 2019 तक एलओसी के दोनों ओर यह एकमात्र आम दिन था। जम्मू और कश्मीर में 2019 से सार्वजनिक अवकाश होना बंद हो गया। पिछले साल, इमरान खान ने ट्वीट किया, ‘हम जम्मू-कश्मीर के अवैध और दमनकारी कब्जे के खिलाफ कश्मीर के लोगों के संघर्ष के लिए उन्हें सलाम करते हैं। 13 जुलाई, 1931 के शहीद, आज के कश्मीरी प्रतिरोधकों के पूर्वज थे। 2018 में, पाकिस्तान ने घाटी में ताजा हिंसा को भड़काने की उम्मीद से 08 जुलाई 2016 को सुरक्षा बलों द्वारा मारे गये आतंकवादी बुरहान वानी को सम्मानित करते हुए डाक टिकट जारी किया, जिसे नजर अंदाज कर दिया गया।

जम्मू और कश्मीर के भारत में विलय के उपलक्ष्य में पाकिस्तान 27 अक्टूबर को काला दिवस के रूप में मनाता है। वह विश्व भर में ऐसा करता है और अपने सभी दूतावासों को कश्मीर विवाद को उजागर करने के लिए विरोध प्रदर्शन और कार्यक्रम आयोजित करने के लिए कहता है। वर्षों से हो रहा यह आयोजन किसी भी तरह का समर्थन जुटाने में विफल रहा है। यूके और कनाडा जैसे देशों में, पाकिस्तान खालिस्तान समर्थकों को आकर्षित करने का प्रबंध करता है। सऊदी अरब और यूएई ने उस दिन किसी भी कार्यक्रम के आयोजन से पाक दूतावास पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके विपरीत, भारत 22 अक्टूबर को काला दिवस के रूप में चिह्नित करता है, जिस दिन पाक हमलावरों ने कश्मीर में प्रवेश किया था।

हालाँकि, पाकिस्तान जानता है कि उसका ब्लैक डे कार्यक्रम विश्व स्तर पर एक वित्तीय बर्बादी है। 2021 में, इसे व्यर्थता समझते हुए, पाक विदेश मंत्रालय ने इसको मनाने के लिए प्रति दूतावास केवल 1000 अमरीकी डालर आवंटित किया।

इसके अलावा, पाकिस्तान 19 जुलाई को यौम-ए-इल्हाक-ए-पाकिस्तान (पाकिस्तान में प्रवेश) दिवस के रूप में मनाता है। 1947 में आज ही के दिन पाकिस्तान ने दावा किया था कि कश्मीर विधानसभा ने उसे स्वीकार करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था। इस घटना को केवल पीओके में रैलियों के आयोजन के जरिये मनाया जाता है।

पाकिस्तान के रक्षा दिवस, 06 सितंबर, 1965 में जीत का जश्न मनाने और 23 मार्च को पाकिस्तान दिवस सहित अन्य प्रमुख राष्ट्रीय दिवसों पर भी, इसके नेता केवल कश्मीर की बात करते हैं। इनके नेताओं के संबोधन में देश के विकास या समस्याओं का कोई जिक्र नहीं होता बल्कि सिर्फ कश्मीर, कश्मीर और कश्मीर का जिक्र रहता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कश्मीर सभी पाकिस्तानियों को एकजुट करने का नाम है।

इन भारत विरोधी तिथियों पर, पाकिस्तान को घाटी में कट्टरपंथी हुर्रियत गुट से कुछ समर्थन प्राप्त था। कहीं-कहीं पाक के झंडे फहराते नजर आते हैं। इस गुट के टूटने, एनआईए की छापेमारी और हवाला फंड के प्रवाह को रोकने से उनका समर्थन समाप्त हो गया है। घाटी पाकिस्तान के समर्थन के आह्वान को नजरअंदाज करती है।

यहां तक कि पाकिस्तान के भीतर भी, यह महसूस किया जा रहा है कि उसने कश्मीर पर वैश्विक समर्थन खो दिया है। ओआईसी, जिस पर पाकिस्तान को भरोसा था, ने कश्मीर पर एक विशेष सत्र की उसकी मांगों की अनदेखी की है। इन तिथियों को मनाना पाकिस्तान के लिए आर्थिक नुकसान का सबब बना हुआ है, लेकिन उन्हें रोक देने से राजनीतिक और उग्रवादी समूहों की ओर से घनघोर विरोध होगा, इसलिए पाकिस्तान की सरकार इन तिथियों का अनुसरण करती रहती है।

पाकिस्तान के आधिकारिक कैलेंडर में भारत विरोधी और कश्मीर समर्थक दिवस इस क्षेत्र के प्रति उनके जुनून को ही उजागर करते हैं। पाकिस्तान के कैलेंडर में अभी कुछ महीने ऐसे बाकी हैं जिनमें कश्मीर का जिक्र नहीं है। भारत विरोधी अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करने के लिए उसे उन महीनों में भी एक दिन जोड़ना होगा। हालांकि ऐसा करने से न तो भारत पर कोई फर्क पड़ेगा और न ही दुनिया पर कोई असर पड़ेगा।

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लेखक
मेजर जनरल हर्ष कक्कड़, रक्षा प्रबंधन कॉलेज, सिकंदराबाद में सामरिक अध्ययन विभाग के प्रमुख थे।
वह टोरंटो में कैनेडियन फोर्स कॉलेज में राष्ट्रीय सुरक्षा अध्ययन पाठ्यक्रम के पूर्व छात्र हैं। जनरल कक्कड़ 
बड़े पैमाने पर समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और ऑनलाइन न्यूज़लेटर्स के लिए लिखते हैं। उनके लेखों में 
अंतरराष्ट्रीय संबंधों, रणनीतिक खतरों (दक्षिण एशिया पर जोर देने के साथ सैन्य और गैर-सैन्य दोनों), 
रक्षा योजना और क्षमता निर्माण, राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक-सैन्य सहयोग शामिल हैं।

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