• 06 December, 2022
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हालिया आतंकी हमला दिखाता है कि आईएसआईएस को युद्धक्षेत्र में हराने से मुश्किल है ऑनलाइन हराना


रवि, 05 सितम्बर 2021   |   3 मिनट में पढ़ें

हैमिल्टन (न्यूजीलैंड), पांच सितंबर (द कन्वरसेशन) : न्यूजीलैंड के एक सुपरमार्केट में इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) से जुड़े आतंकवादी के शुक्रवार के हमले ने दिखाया है कि आईएसआईएस की चरमपंथी विचारधारा अभी भी पश्चिमी देशों में कुछ मुसलमानों को अपने पक्ष में करने की मजबूत अपील रखती है। आईएसआईएस की विचारधारा सीरिया और इराक में आईएसआईएल (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड द लेवेंट) की हार और खलीफा राज स्थापित करने की उसकी योजनाओं के साथ समाप्त नहीं हुई है।

आईएसआईएस उन लोगों को कट्टरपंथी बनाने की कोशिश कर रहा है जो पश्चिम विरोधी विमर्शों के प्रति अतिसंवेदनशील हैं। सोशल नेटवर्क, डार्क वेब (इंटरनेट साइटों का छिपा हुआ समूह जहां तक केवल एक विशेष वेब ब्राउज़र द्वारा पहुंचा जा सकता है) और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म आईएसआईएस की कट्टरपंथी विचारधारा के वैश्विक प्रसार जारी रखे हुए हैं। शुक्रवार के आतंकवादी हमले के लिए जिम्मेदार श्रीलंकाई नागरिक के निजी कंप्यूटिंग उपकरणों पर आईएसआईएस से जुड़ी विषय-मग्रियां पूर्व में मिली थी और उसे इस कारण सोशल मीडिया साइटों के इस्तेमाल से प्रतिबंधित कर दिया गया था।

इसलिए हमें उसे ‘स्वतंत्र आतंकवादी’ के रूप में वर्णित करने से सावधान रहना चाहिए। हो सकता है कि उसने अकेले हमला किया हो, बिना किसी आतंकवादी समूह के प्रत्यक्ष सहयोग के, लेकिन उसकी विचारधारा और उसे कट्टरपंथी बनाने की प्रक्रिया उन वैश्विक समूहों से जुड़ी हुई है जो जानबूझकर अपने विद्वेषपूर्ण वैश्विक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने और अपने विचारों के लिए नए लोगों को आकर्षित करने की फिराक में रहते हैं।

आईएसआईएस को हराना इतना मुश्किल क्यों

कोविड-19 वैश्विक महामारी के कारण हो सकता है कि कट्टरपंथ अस्थायी रूप से घटा हो लेकिन ऐसी आशंकाएं हैं कि महामारी के बाद , आतंकवाद विश्व स्तर पर एक बड़ी समस्या बन जाएगा। असल में, आईएसआईएस कभी हारा ही नहीं। इराक और सीरिया में उनकी सैन्य हार ने अफगानिस्तान सहित अन्य देशों तक खतरे का विस्तार किया है। तालिबान द्वारा अफगानिस्तान में एक इस्लामी अमीरात की घोषणा के बाद, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्लामी हिंसा के फिर से सिर उठाने के बारे में चिंताएं बढ़ गई हैं।

तालिबान आईएसआईएस का दोस्त नहीं है और काबुल हवाईअड्डे को आईएसआईएस के हमलों से बचाने के लिए नयी तालिबान सरकार से पहले ही कुछ सहयोग भी मिल चुका है। लेकिन चरमपंथी अफगानिस्तान में अमेरिका नीत सैन्य गठबंधन की हार से प्रेरित हुए हैं और मुस्लिम और गैर-मुस्लिम लोगों के बीच संघर्ष की अपनी वैश्विक आकांक्षा को जारी रखने के लिए उत्साहित हुए हैं।

ऑनलाइन आतंकवादियों से लड़ने के वैश्विक प्रयास

ऑनलाइन आतंकवाद से लड़ने के प्रयास तेज हुए हैं लेकिन खतरा उभरता जा रहा है। उपयोगकर्ताओं को चरमपंथी सामग्री के लिए निर्देशित करने में सोशल मीडिया एल्गोरिदम की भूमिका पर अब ध्यान दिया गया है, और इस साल की शुरुआत में अमेरिकी संसद भवन (कैपिटल) पर हमले सहित दूर-दराज़ समूहों से निरंतर वैश्विक खतरे पर भी, जिसे ऑनलाइन आयोजित किया गया था।

हमलों को रोक पाना इतना चुनौतीपूर्ण क्यों है

शुक्रवार को न्यूजीलैंड में जिस तरह का हमला हुआ, उसे रोकना बेहद मुश्किल है। इससे पहले इसी तरह की कई घटनाएं हुई हैं, जिसमें 2013 में ब्रिटेन के सैनिक ली रिग्बी की हत्या और हाल ही में 2017 का लंदन ब्रिज हमला शामिल है, जिसमें एक इस्लामी चरमपंथी द्वारा एक वाहन और चाकू के हमले में आठ लोग मारे गए थे।

पहली समस्या संसाधनों की है। हिंसा की किसी घटना की साजिश रच रहे व्यक्तियों की 24 घंटे निगरानी करना मुश्किल होता है। अपराधियों को उनकी हिंसक मान्यताओं पर काम करने से रोकना मुश्किल है और यह अनुमान लगाना भी असंभव है कि उनकी ये मान्यताएं कब किसी घटना में तब्दील हो जाएगी। इंटरनेट प्लेटफॉर्म की अधिक व्यापक और दखल देने वाली इलेक्ट्रॉनिक निगरानी एक विकल्प है लेकिन लोकतांत्रिक समाज अधिक कठोर कार्रवाई का उपयोग करने के लिए स्वाभाविक रूप से थोड़ा नरम रुख अपनाते हैं खासकर इसलिए क्योंकि पूरा समुदाय लक्षित महसूस कर सकता है।

सामाजिक एकता ही है समाधान

शायद इस तरह के हमलों का मुकाबला करने का सबसे अच्छा और एकमात्र तरीका सामुदायिक लचीलापन एवं एकजुटता है। शुक्रवार का आतंकवादी हमला अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी और इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (आईएसआईएस- के-आईएसआईएस से संबद्ध आतंकी संगठन) के हमले की वैश्विक पृष्ठभूमि में हुई। मध्य एशिया में आतंकवाद और ऑकलैंड हमले को सीधे तौर पर जोड़ना उचित नहीं होगा। लेकिन यह दिखाता है कि आईएसआईएस ऑनलाइन भर्तियां कर रही है और उसे युद्धक्षेत्र से मुश्किल यहां हराना है।

(जो बर्टन, सीनियर लेक्चरर, न्यूजीलैंड इंस्टीट्यूट फॉर सिक्योरिटी एंड क्राइम साइंस, यूनिवर्सिटी ऑफ वाइकाटो)

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