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Geopolitics & National Security
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जरूरी था देवबंद में एटीएस कमांडो सेंटर की स्‍थापना

विक्रम सिंह, पूर्व डीजीपी, उप्र
शुक्र, 07 जनवरी 2022   |   5 मिनट में पढ़ें

यह अत्‍यंत हर्ष का विषय है कि हाल ही में देवबंद में एटीएस की नवीनतम शाखा खोली गई है। यह आवश्‍यक है और प्रासंगिक भी। क्‍योंकि स्‍मरण रहे कि 1994 के अंत में अलकायदा के नंबर दो उमर शेख को सहारनपुर में एक बड़ी ही विषम मुठभेड़ के उपरान्‍त गिरफ्तार किया गया था। इस मुठभेड़ में इंस्‍पेक्‍टर ध्रुवलाल यादव शहीद हुए और एक कांस्‍टेबल भी शहीद हो गए थे। मुठभेड़ के उपरान्‍त बंधक बनाए गए तीन ब्रिटिश नागरिक और एक अमेरिकी नागरिक को छुड़ाया गया। 22 फरवरी 2019 को देवबंद के मोहल्ला खानकाह स्थित एक छात्रावास से दो कश्मीरी आतंकियों को एटीएस की टीम ने गिरफ्तार किया था। इसके बाद से ही देवबंद खुफिया एजेंसियों की नजर में है। तब से ही यहां एटीएस कमांडो सेंटर खोले जाने की कवायद चल रही थी।

यह स्‍थान आज से नहीं काफी समय से अत्‍यंत संवेदनशील है। इसलिए शासन को और पुलिस महानिदेशक को मैं बधाई देना चाहूंगा कि इस देवबंद एटीएस कार्यालय की बहुत आवश्‍यकता है। क्‍योंकि अभि‍सूचना संकलन, अपराधियों के आवागमन, उनके द्वारा की जाने वाली कार्यवाही, लापता पाकिस्‍तानी नागरिक, इस दृष्टिकोण से भी यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील है। मुझे पूरा विश्‍वास है कि अन्‍य कार्यालयों की भांति देवबंद सफलता के नए कीर्तिमान स्‍थापित करेगा। इसके अतिरिक्‍त प्रदेश और प्रदेश की जनता को सुरक्षा उपलब्‍ध कराने में अपना योगदान देगा।

संगठित अपराध खत्‍म करने को तैयार हुई सर्वश्रेष्‍ठ टीम

उत्‍तर प्रदेश में संगठित अपराधियों, माफि‍याओं और राष्‍ट्र विरोधी तत्‍वों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए स्‍पेशल टास्‍क फोर्स यानी एसटीएफ का गठन किया गया था। तदुपरांत यह तथ्‍य प्रकाश में आए कि राष्‍ट्र विरोधी गतिविधियां एवं नेपाल से लगी हुई सीमा के 13 जनपदों में जाली भारतीय मुद्रा, मादक पदार्थों की तस्‍करी बड़े पैमाने पर होने की जानकारी मिली। तात्‍कालीन शासन ने एटीएस का गठन किया। जो कि एडीजी लॉ एंड ऑर्डर के अधीनस्‍थ क्रियाशील रही और इसमें भी एसटीएफ के समान चुने हुए अधिकारी जो स्‍वेच्‍छा से आना चाहते थे, जिनकी कार्यपद्धति और सत्‍यनिष्‍ठा बहुत उच्‍च कोटि की थी, उनको चयन किया गया। इनका साक्षात्‍कार पुलिस महानिदेशक स्‍तर पर यानी मेरे द्वारा लिया गया और कांस्‍टेबल से लेकर वरिष्‍ठतम अधिकारियों के चरित्र पंजिका के मूल्‍यांकन के उपरान्‍त इनका चयन एटीएस के लिए हुआ। उल्‍लेखनीय है कि एटीएस में प्रदेश के सर्वश्रेष्‍ठ अधिकारी रहे। जैसे श्री अरविंद कुमार जैन, श्री राजीव कुमार, श्री राजीव सब्रवाल, श्री असीम अरुन आदि। इसमें कई अधिकारी आइआइटी के टॉपर भी रहे हैं और उनके द्वारा एक अद्भुद गुणवत्‍ता कार्य पद्धति को प्रदान की गई।

आधुनिक प्रशिक्षण व उपकरणों से लैश हुइ्र एटीएस

इसके उपरांत एसटीएफ संगठित अपराध एवं माफिया की तरफ अपना ध्‍यान लगाने लगी। एटीएस ने केन्‍द्र की आइबी और अन्‍य सूचना एजेन्सियों के साथ समन्‍वय करके अपने सूत्र व सूचना तंत्र को मजबूत किया। जो अधिकारी और कर्मचारी चुने गए उनको सर्वोच्‍च प्राथमिकता के आधार पर जो विश्‍व में सर्वश्रेष्‍ठ टेक्‍नोलाजी थी, वह उपलब्‍ध कराई गई। इन टेक्‍नोलाजी में बिग डाटा एनलिटिक्‍स, फेस रिकग्निशन सॉफ्टवेयर, मशीन लर्निंग, रोबोटिक्‍स, इलेक्‍ट्रॉनिक सर्विलांस आदि उपकरण व तकनीकि मुहैया कराई गई। इसके अतिरिक्‍त वह तमाम उपकरण व हथियार उपलब्‍ध कराए गए जो सामान्‍यत: लोग फिल्‍मों में देखते हैं। उनको उच्‍च कोटि का प्रशिक्षण दिया गया। विभिन्‍न स्‍थानों पर प्रशिक्षण की व्‍यवस्‍था की गई। इसकी सफलता को दृष्टिगत रखते हुए नोएडा, मेरठ, आगरा और हाल ही में देवबंद में एटीस के कार्यालय खोले गए। लखनऊ कार्यालय मुख्‍यालय के रूप में क्रियाशील है और बाकी स्‍थानों पर वरिष्‍ठ अधिकारी सूचना संकलन के साथ-साथ आपरेशंस भी चलाते रहते हैं। प्रदेश में और भी जगहों पर एटीएस सेंटर खोलने के लिए शासन ने जमीन भी मुहैया करा दी है।

सफलता मिली तो अन्‍य प्रदेशों में भी बनी एटीएस

यह अत्‍यंत हर्ष और संतोष का विषय है कि अपने इस छोटे से कार्यकाल में एटीएस को अभूतपूर्व सफलता मिली है जिसकी सर्वत्र प्रशंसा की जा रही है। केवल प्रदेश में ही नहीं भारत सरकार और पूरे देश में एटीएस की व्‍यवसायिक दक्षता, सूचना संकलन, व्‍यूह रचना, युद्ध कौशल, की प्रशंसा हो रही है। यही कारण है कि एटीएस ने गुडम्‍बा में आइएसआइ एजेंट, लखनऊ में एक आाइएसआइ एजेंट को निष्क्रिय किया। कानपुर में गिरफ्तरियां हुईं। नकली भारतीय मुद्रा बड़ी मात्रा में बरामद की गई। उल्‍लेखनीय है कि एटीएस की कार्यशैली इतनी पारदर्शी और इतनी वैज्ञानिक और सुविचारित है कि कोई भी प्रकरण मानवाधिकार के उल्‍लंघन का एटीएस का सामने नहीं आया है। एटीएस की सत्‍यनिष्‍ठा और कार्यपद्धति अनुकरणीय है। यही कारण है कि कई प्रदेशों ने एटीएस के अधिकारियों के माध्‍यम से अपने राज्‍यों में एटीएस की शाखाएं खुलवाईं हैं और उसके संबंद्ध में वांछित प्रशिक्षण, हथियार आदि की जानकारी भी प्राप्‍त की है।

आचरण व प्रशिक्षण का होता है मूल्‍यांकन

एटीएस के कर्मचारियों का और उनके कार्य व आचरण का निरंतर मूल्‍यांकन होता रहता है। ऐसा नहीं है कि एक बार एटीएस में प्रवेश पाने के उपरान्‍त उसकी समीक्षा नहीं होती है। उसके चरित्र पर, उसके कार्यक्षमता की निगरानी निरंतर की जाती है। यदि कोई चीज ऐसी दृष्टिगोचर होती है जो उसकी कार्यक्षमता को प्रभावित करती है तो तत्‍काल ऐसे अधिकारी व कर्मचारी को एटीएस से हटा भी दिया जाता है। यह संतोष का विषय है कि एटीएस में प्रशिक्षण पर बहुत बल दिया जाता है। और जिन विषयों में अधिक जोर रहता है वह है हथियारों का रखरखाव, फायरिंग, नाइट फायरिंग, कंसीलमेंट कैमोफ्लाजिंग, जंगल वार फेयर, फील्‍डक्राफ्ट और टैक्टिक्‍स। इन सभी विधाओं को जिसकी एक युद्ध कौशल में आवश्‍यकता पड़ सकती है, उन सभी में एटटीएस के अधिकारी व कर्मचारियों को पारंगत किया जाता है। कमांडो कोर्स पर भी विशेष बल दिया जाता है।

वर्ष 2007 में हुआ एटीस का गठन

उत्‍तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश में आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए वर्ष 2007 में आतंकवाद निरोधी दस्‍ते यानी एटीएस का गठन किया। तब से एटीएस उत्‍तर प्रदेश पुलिस की एक विशेष इकाई के तौर पर कार्यरत है। इसके अंतर्गत प्रदेश के विभिन्‍न जिलों में एटीएस मुख्‍यालय फील्‍ड इकाईयों में कई आपरेशन दल हैं। आपरेशन टीमों और फील्‍ड इकाईयों को सटीक और महत्‍वपूर्ण सहायता प्रदान करने के लिए अन्‍य विशिष्‍ट इकाईयां एटीस मुख्‍यालय में कार्य कर रही हैं। राज्‍य की विस्‍तृत सीमा और आतंकवाद व नक्‍सलवाद की समस्‍या को देखते हुए 2017 में प्रदेश सरकार ने एटीएस के तहत स्‍पेशल पुलिस आपरेशन टीम यानी स्‍पॉट का गठन किया। स्‍पॉट टीमों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। इनके पास विशेष व आधुनिक हथियार भी है। वर्तमान में स्‍पॉट की पांच टीमें प्रदेश के विभिन्‍न जिलों में रणनीतिक स्‍थानों पर स्थित हैं।

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लेखक
विक्रम सिंह,सेवानिवृत्‍त आइपीएस अफसर व उत्‍तर प्रदेश पुलिस के पूर्व डीजपी हैं। उत्‍तर प्रदेश पुलिस में आतंकवाद निरोधी दस्‍ता यानी एंटी टेररिस्‍ट स्‍क्‍वाड यानी एटीएस के गठन की शुरुआत इनके कार्यकाल में ही हुई थी। वह जून 2007 से सितंबर 2009 तक उत्‍तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक रहे। इससे पहले एडीजी सीआइएसएफ, एडीजी इंटर स्‍टेट बार्डर फोर्स, और एडीजी लॉ एंड ऑर्डर स्‍पेशल टास्‍क फोर्स भी रहे। उन्‍हें वीरता के लिए प्रेसीडेंट पुलिस अवार्ड सहित 11 अवार्ड मिले हैं। वह वर्तमान में नोएडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में प्रो-चांसलर हैं।

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