• 26 November, 2022
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‘फक्र-ए-हिंद’ की शान में तारापोर ने दी थी दुश्‍मन टैंकों की आहुति

कर्नल शिवदान सिंह
सोम, 10 जनवरी 2022   |   8 मिनट में पढ़ें

भारत और पाकिस्‍तान के बीच हुए युद्ध में वर्ष 1965 का युद्ध कई मायनों में यादगार है। द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद सबसे भीषण टैंक बैटल्‍स यानी टैंक युद्ध में ‘बैटल आफ फिलोरा’ का नाम भी दर्ज है। सियालकोट क्षेत्र में हुआ यह युद्ध असल उत्‍तर के युद्ध के समानांतर ही चल रहा था। इस युद्ध में भारतीय सेना के सेंचुरियन टैंकों से निकले गोलों ने दुश्मन के आधुनिक पैटन टैंकों के परखच्चे ही नहीं उड़ाए बल्कि उनके दिलों में कभी न खत्म होने वाली दहशत भी भर दी। युद्ध के इतिहास में पराक्रम व बहादुरी की ऐसी ही लकीरें भारतीय फौज की आर्मर्ड बटालियन पुणा हॉर्स ने लेफ्टिनेंट कर्नल एबी तारापोर की अगुवाई में खीची थी। फिलोरा में दुश्‍मन के टैंक डिवीजन से सीधी भिड़ंत के दौरान बुरी तरह जख्‍मी होने के बावजूद चिकित्‍सकीय मदद के लिए रुकने की बजाय सैनिकों को टैंक के साथ आगे बढ़ने का आदेश देते हुए ले. कर्नल तारापोर खुद उनकी अगुवाई करते हुए तब तक बढ़ते रहे, जब तक उन्‍होंने दुश्‍मन के दर्जनों टैंकों के परखच्‍चे नहीं उड़ा दिए और मातृभूमि की रक्षा के लिए शहादत को गले लगा लिया। खुद से पहले देश को रखने वाले अमर शहीद लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्जोरजी तारापोर को मरणोपरांत सर्वोच्‍च वीरता सम्‍मान परमवीर चक्र से नवाजा गया।

 

जन्‍म से दूसरे की जमीन हड़पने की मंशा रखता है पाकिस्‍तान

भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद पाकिस्तान में सामंतशाही पहले से भी ज्यादा मजबूत हुई और वहां की सेना सामंतशाही का प्रमुख हिस्सा बनी जो अभी तक है। सामंतशाही में जागीरदार और बड़े-बड़े भूमिपति ज्यादा से ज्यादा जमीनों पर कब्जा करके अपनी सामंतशाही चलाते हैं। इसीलिए पाकिस्तानी सेना ने बंटवारे के फौरन बाद जम्मू कश्मीर राज्य पर कब्जा करने की योजना बनाई। बुरी तरह हारने लगे तो दुनिया के सामने खुद को बचाने की गुहार लगाने संयुक्‍त राष्‍ट्र में नतमस्‍तक हो गए। उसी समय युद्ध रुक जाने के कारण कश्‍मीर का एक हिस्‍सा पीओके बन गया जो अब तक नहीं सुलझाया जा सका।

इसके बाद 1962 में चीन ने लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक भारत पर हमला कर दिया और दुर्भाग्य से भारत के अक्साईचिन क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। इसका मुख्य कारण था भारत 1947 में आजाद हुआ और इसके बाद भारतीय शासकों ने देश में गरीबी उन्मूलन और विकास को प्राथमिकता दी। जिसके कारण दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में संचार के साधन विकसित नहीं हुए और सेना को भी आधुनिक गोला बारूद उपलब्ध नहीं कराया जा सका। पाकिस्तानी सेना ने जब देखा कि भारतीय सेना इस समय किसी भी प्रकार के युद्ध के लिए तैयार नहीं है और 1962 के परिणामों के बाद भारतीय सेना का मनोबल काफी नीचे है, तो उन्‍होंने यह समझा की यह उचित समय है जब भारत से कश्मीर को छीना जाए।

 

दंगा कराकर जीतना चाहा था कश्‍मीर

पाकिस्तानी सेना ने अगस्त 1965 में ऑपरेशन जिब्राल्टर के द्वारा अपने सैनिकों को कश्मीरियों के वेश में कश्मीर घाटी में घुसा दिया। इसका मुख्य उद्देश्य उस समय वहां उर्स के मेले में दंगे करवा कर विश्व को दिखाना था कि कश्मीर के निवासी भारत में खुश नहीं है और वह अलग होकर पाकिस्तान में अपने राज्य का विलय चाहते हैं। परंतु कश्मीर के निवासियों ने स्वयं भारतीय सैनिकों को इन घुसपैठियों के बारे में सूचना दी। जिसके बाद भारतीय सेना ने इन घुसपैठियों को पकड़कर पाकिस्तान के ऑपरेशन जिब्राल्टर को नाकाम किया। इसके फौरन बाद सितंबर 1965 में ही पाकिस्तान ने अपने ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम के अंतर्गत दोबारा भारत पर हमला कर दिया। पाकिस्तान के इस हमले का मुख्य उद्देश्य कश्‍मीर घाटी में तैनात भारतीय सेना का सड़क मार्ग से संबंध देश के मुख्य भाग से तोड़ना था। इसका जवाब देने के लिए भारतीय सेना ने 6 सितंबर 1965 को रेडक्लिफ नामक रेखा, जो भारत पाकिस्तान की सीमा निर्धारित करती है, उसको पार करते हुए सियालकोट सेक्टर पर कब्जा करने की योजना बनाई। इसके लिए भारतीय सेना की 1 कोर जिसको स्ट्राइक कोर नाम से बुलाया जाता है, को इस हमले की जिम्‍मेदारी दी गई।

घर में घुसकर पाकिस्‍तान को दिर्खा हैसियत

1 कोर को टैंको की सहायता देने के लिए भारतीय सेना की एक मात्र आर्मर्ड डिवीजन फर्स्‍ट ब्‍लैक एलिफैंट आर्मर्ड डिविजन को एक कोर के साथ भेजा गया। इस आर्मर्ड डिवीजन का हिस्‍सा पुणा हॉर्स आर्मर्ड रेजीमेंट भी थी जिसकी कमान कर्नल एबी तारापोर के हाथों में थी। ‘फक्र-ए-हिंद’ के नाम से पहचानी जाने वाली पुणा हॉर्स को इस ऑपरेशन के अंतर्गत पाकिस्तान के सियालकोट क्षेत्र में फिलोरा पर हमले की जिम्मेवारी सौंपी गई। जिसके लिए पुणा हॉर्स ने पाकिस्तानी सेना को चोकाने के लिए अचानक 11 सितंबर 1965 को फिलोरा पर पीछे से हमला किया। इस हमले के दौरान फिलोरो और चाविंडा के बीच पहुंची पुणा हॉर्स को पाकिस्तानी आर्मर्ड यूनिट ने वजीरवाली की ओर से के काउंटर अटैक किया। ले. कर्नल तारापोर ने दुश्‍मन के सामने पीछे हटने की बजाय अपनी रेजिमेंट को दो हिस्सों में इस प्रकार बांटा की एक हिस्सा वजीरवाली से आने वाले टैंकों का मुकाबला करें और दूसरा फिलोरा पर पूर्व निर्धारित हमले को पूरा करें।

जख्‍म मलहम का इंतजार करता रहा, तारापोर जीतने को आगे बढ़ते रहे

ले. कर्नल तारापोर के निर्देशों के अनुसार वजीरवाली से आने वाले टैंकों को परास्त करते हुए उनकी रेजीमेंट ने अपनी इन्‍फैंट्री के साथ 14 सितंबर को वजीरवाली पर कब्जा कर लिया। इसके बाद फिलोरा पर कब्जा करने के लिए आगे बढ़ने के दौरान वह जख्‍मी हो गए लेकिन इलाज के लिए रुकने की बजाय आगे बढ़ते रहे। पाकिस्तान के जसोसन और बुटुर डोगरांडी नाम के दो गांव पर भी 16 को कब्जा कर लिया था। 16 सितंबर को जसोसन पर 9 डोगरा और बुटुर डोगरांडी पर कब्जे के लिए 8 गढ़वाल राइफल्स इन्‍फैंट्री बटालियन के साथ पुणा हॉर्स ने हमले किए। वजीरवाली पर कब्जे के दौरान ले. कर्नल तारापोर के टैंक को कई गोले लगे जिममें वह काफी जख्‍मी हो हो चुके थे। उन्हें तुरंत चिकित्‍सकीय सहायता की आवश्यकता थी। उनके शरीर से काफी खून बह चुका था। परंतु उन्होंने अपने मिशन को पूरा करने के लिए चिकित्‍सकीय सहायता के लिए पीछे हटने से मना कर दिया और घायल अवस्था में ही जसोस और डोगरांडी पर कब्जे के लिए आगे बढ़े। इस दौरान उनकी यूनिट ने दुश्‍मन के 60 से अधिक  टैंक नष्‍ट कर दिए थे जबकि केवल नौ भारतीय टैंक छतिग्रस्‍त हुए थे। अंत में दुश्‍मन के गोले से उनका टैंक उड़ा दिया जिससे वह वीरगति को प्राप्‍त हुए।

खुद से पहले रखा देख, तब बने पीवीसी

इस प्रकार उन्होंने घायल अवस्था में भी युद्ध भूमि में डटे रहकर भारतीय सैनिकों का मनोबल बढ़ाया जिसके कारण भारतीय सेना फिलोरा में पाकिस्तानी सेना को हराकर कब्जा कर सकी। वजीरवाली और डोगरांडी के युद्धों में ले. कर्नल तारापुर घायल अवस्था में भी अग्रिम पंक्ति में रहे और उनके दिशा निर्देश में सैनिकों ने पाकिस्तान के तोपखाने की भारी फायरिंग और उसके टैंकों की मौजूदगी में पाकिस्तान के टैंक बर्बाद कर दिए। इस प्रकार उन्होंने फिलोरा के आसपास के क्षेत्र को पाकिस्तानी टैंकों की कब्रगाह बना दिया था। इसके बाद घबराकर पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व की बड़ी शक्तियों से युद्ध विराम की गुहार लगाने लगा। जिसके कारण भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह अयूब खान के बीच में ताशकंद समझौता हुआ और इस प्रकार 1965 का युद्ध समाप्त हुआ।

 

फ्लोरा के हमले में घायल अवस्था में होते हुए भी डटे रहकर अपने मिशन को शौर्य और साहस से पूरा करने के उपलक्ष में भारत सरकार ने युद्ध के बाद ले. कर्नल एबी तारापोर को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया।

खुल गया था दुश्मन की झूठ का पुलिंदा

युद्ध के बाद से ही अपने देशवासियों के सामने नाक बचाने के लिए पाकिस्तानी सेना ने 65 की लड़ाई में अपनी जीत का ढिंढोरा पीटा था। फील्ड मार्शल अय्यूब खान की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में सचिव रहे अल्ताफ गौहर ने पहली बार इसका खुलासा किया था। उन्होंने एयर मार्शल एम असगर खान की किताब ‘द फ‌र्स्ट राउंड’ की प्रस्तावना में लिखा था कि ‘सेना के बाहर कुछ लोगों को एहसास हुआ कि 65 की लड़ाई में पाकिस्तान तबाही के कितने करीब आ गया था’। पुणा हॉर्स की स्थापना अंग्रेजी शासनकाल में 15 जुलाई 1817 को पुणा के निकट सिरुर में हुई थी। इसका पहला नाम पुणा ऑग्जिलियरी हॉर्स था। बाद में इसे 3 रेजिमेंट बाम्बे लाइट कैवेलरी के नाम से स्थापित यूनिट के पहले कमान अधिकारी मेजर पी डेलामोट्टे बने। बाद में कई बार पुणा हॉर्स के साथ नाम में कुछ जुड़ाव हुए और वर्ष 1927 में द पुणा हॉर्स नाम पड़ा। इस यूनिट को सर्वाधिक 37 युद्ध सम्मान मिले हैं। इनमें अंग्रेजी शासन का सबसे बड़ा सम्मान चार विक्टोरिया क्रॉस, दो परमवीर चक्र, दो महावीर चक्र, दो वीर चक्र, पांच कीर्ति चक्र व अन्य शामिल हैं। पाकिस्‍तानी जमीं पर लिब्‍बे, फिलोरो, वजीरवाली, जसोरन और बुटुर डोगरांडी में पुणा हॉर्स के रणबांकुरों का पाक्रम देखने के बाद पाकिस्‍तानी सेना ने इस बटालियन को ‘फक्र-ए-हिंद’ नाम दिया था।

 लेफ्टिनेंट कर्नल तारापोर की जीवनी

लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्जोरजी तारापोर का जन्म 18 अगस्त 1923 को महाराष्‍ट्र के बाम्‍बे में हुआ था। उनके पिता पहले एक स्कूल में पारसी और उर्दू के शिक्षक थे। जिसके बाद उन्होंने कस्टम और एक्साइज में सेवा की। कर्नल तारापोर को 7 वर्ष की आयु में शिक्षा के लिए पुणे के एक छात्रावास वाले स्कूल में भेजा गया था। इनकी स्कूली शिक्षा के स्थान पर खेलकूद में ज्यादा रुचि थी। स्कूली शिक्षा के बाद तारापोर 1942 में हैदराबाद राज्य की सेना में भर्ती हो गए और ट्रेनिंग के बाद उन्हें हैदराबाद सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली। शुरू में उन्हें इन्‍फैंट्री में भेजा गया जो उन्हें पसंद नहीं था, क्योंकि वह टैंकों वाली आर्मर्ड कोर में जाना चाहते थे। इसी दौरान एक बार हैदराबाद सेना के प्रमुख उनकी यूनिट के निरीक्षण के लिए आए। इस निरीक्षण के दौरान जब सेना प्रमुख निरीक्षण कर रहे थे, उस समय तारापोर ने एक संदेहात्मक गोले को वहां से अचानक फुर्ती से बाहर फेंका जो हवा में ही फट गया। इस प्रकार उन्होंने सेना प्रमुख की जान बचाई। इस वीरता पूर्ण कार्य को करने के लिए तारापोर को शाबाशी देने के लिए सेना प्रमुख ने उन्हें अपने पास बुलाया। उनसे उनकी इच्छा सेना प्रमुख ने पूछी जिस पर तारापोर ने सेना में आर्मड कोर में जाने की इच्छा जताई। इसके बाद उन्हें हैदराबाद की सेना में आर्मड शाखा में स्थानांतरित कर दिया गया। हैदराबाद सेना की आर्मड रेजीमेंट में ही उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध में पश्चिमी एशिया में भाग लिया। इसके बाद भारत की आजादी के समय हैदराबाद राज्य का भारत में विलय हो गया और इसकी सेना भी भारत की सेना में मिल गई। तारापोर को भारतीय सेना में एक अप्रैल 1951 को कमीशंड अधिकारी के रूप में पुणा हॉर्स नाम की भारतीय सेना की रेजिमेंट में नियुक्ति मिली।

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लेखक
कर्नल शिवदान सिंह (बीटेक एलएलबी) ने सेना की तकनीकी संचार शाखा कोर ऑफ सिग्नल मैं अपनी सेवाएं देकर सेवानिवृत्त हुए। 1986 में जब भारतीय सेना उत्तरी सिक्किम में पहली बार पहुंची तो इन्होंने इस 18000 फुट ऊंचाई के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र को संचार द्वारा देश के मुख्य भाग से जोड़ा। सेवानिवृत्ति के बाद इन्हें दिल्ली के उच्च न्यायालय ने समाज सेवा के लिए आनरेरी मजिस्ट्रेट क्लास वन के रूप में नियुक्त किया। इसके बाद वह 2010 से एक स्वतंत्र स्तंभकार के रूप में हिंदी प्रेस में सामरिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के विषयों पर लेखन कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में चाणक्य फोरम हिन्दी के संपादक हैं।

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