• 06 December, 2022
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ग्लासगो जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन का पहला सप्ताह समाप्त, उम्मीद बढ़ी

भाषा एवं चाणक्य फोरम
शुक्र, 05 नवम्बर 2021   |   5 मिनट में पढ़ें
-ग्लासगो शिखर सम्मेलन में दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने अपने 2030 लक्ष्यों को मजबूत किया।
-सऊदी अरब और रूस की तरह ऑस्ट्रेलिया जलवायु परिवर्तन से निपटने के कदम उठाने से बचता दिख रहा है।
-विकासशील देश चाहते हैं अमीर देश नए लक्ष्य का संकल्प लेने से पहले वित्तीय मदद देने में प्रतिबद्धता बढ़ाएं।
-100 से अधिक देशों ने 2030 तक मीथेन उत्सर्जन 30 प्रतिशत तक करने के नए संकल्प पर हस्ताक्षर किए।
-120 से अधिक देशों ने 2030 तक वन कटाई रोकने का संकल्प लिया। 2021 में वैश्विक उत्सर्जन तेजी से बढ़ा।

 

ब्रिस्बेन (ऑस्ट्रेलिया), पांच नवंबर (द कन्वरसेशन) : ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन का पहला सप्ताह समाप्त होने वाला है। हालांकि अभी लंबी दूरी तय करनी है, अब तक की प्रगति से थोड़ी उम्मीद बंधती है कि छह साल पहले हुआ पेरिस जलवायु समझौता कारगर साबित हो रहा है।

दुनिया की कई बड़ी शक्तियों ने इस दशक उत्सर्जन में कटौती के लिए उल्लेखनीय प्रतिबद्धताएं जताईं और निवल शून्य उत्सर्जनों की ओर बढ़ने का संकल्प लिया। कोयले से बिजली का उत्पादन बंद करना, वैश्विक स्तर पर मीथेन उत्सर्जन में कटौती का संकल्प, वनों की कटाई रोकना और नौवहन में निवल-शून्य उत्सर्जन संबंधी योजना समेत वैश्विक अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों में कार्बन का इस्तेमाल कम करने के लिए नए गठबंधनों की भी घोषणा की गई।

सीओपी26 के नाम से जाना जाने वाला दो सप्ताह का यह शिखर सम्मेलन जलवायु संकट से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग की अहम परीक्षा है। पेरिस समझौते के तहत, देशों को हर पांच साल में उत्सर्जन कम करने के लिए और महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय योजनाएं बनाने की आवश्यकता है। कोविड-19 वैश्विक महामारी के कारण एक साल की देरी के बाद इस साल नई योजनाएं बनाई जा रही हैं।

शिखर सम्मेलन में अब तक लिए गए संकल्प वैश्विक उत्सर्जन वक्र को नीचे की ओर मोड़ना शुरू कर सकते हैं। मेलबर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माल्टे मीनशौसेन समेत विशेषज्ञों के एक दल ने विश्वसनीय अनुमान लगाया है कि यदि नए संकल्पों के लिए पर्याप्त धन मुहैया कराया जाता है और उन्हें पूरा किया जाता है, तो ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ को इस सदी में 1.9 डिग्री सेल्सियस तक सीमित किया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने भी इसी प्रकार का निष्कर्ष निकाला है।

FILE PHOTO: Extinction Rebellion protest during COP26 in Glasgow.

यह असल प्रगति है। पृथ्वी की प्रणाली शिखर सम्मेलनों में किए वादों से नहीं, बल्कि पर्यावरण में बदलाव के लिए वास्तविक कदम उठाने पर ही प्रतिक्रिया देती है। इसलिए संकल्पों को पूरा करने के लिए वित्तीय मदद, आवश्यक नीतियों और ऊर्जा एवं भूमि इस्तेमाल के क्षेत्र में कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।

इस दशक में विनाशकारी ‘ग्लोबल वार्मिंग’ से बचने के लिए जलवायु परिवर्तन से निपटने संबंधी आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता है। ग्लासगो में वार्ता के दूसरे सप्ताह के दौरान 2030 तक आवश्यक उत्सर्जन की कमी का लक्ष्य हासिल करने पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया जाएगा। यह खासकर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि (कोविड-19 के कारण पिछले साल आई कमी के बाद) 2021 में वैश्विक उत्सर्जन के तेजी से बढ़ने की आशंका है।

ऑस्ट्रेलिया ने ग्लासगो में वैश्विक प्रयासों में कोई वास्तविक योगदान नहीं दिया। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ऑस्ट्रेलिया एकमात्र ऐसा देश है, जिसने इस दशक में उत्सर्जन की कटौती का कोई नया लक्ष्य तय नहीं किया गया है। ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब और रूस की तरह जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कदम उठाने से बचता दिख रहा है।

COP26 in Glasgow.

वैश्विक कार्रवाई: बड़ी शक्तियों ने ग्लासगो में क्या योगदान दिया?

संयुक्त राष्ट्र के पिछले जलवायु शिखर सम्मेलन के बाद से हमने जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में की जाने वाली कोशिशों में बढ़ोतरी देखी है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में दो-तिहाई से अधिक योगदान देने वाले दुनिया के 100 से अधिक देशों ने निवल शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए निश्चित तिथियां निर्धारित की हैं।

ग्लासगो शिखर सम्मेलन में अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, जापान, कनाडा, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड समेत दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने अपने 2030 लक्ष्यों को मजबूत किया। जी7 समूह के देशों ने 2030 तक अपना सामूहिक उत्सर्जन आधा करने का संकल्प लिया।

विकासशील दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने भी सीओपी26 में नई प्रतिबद्धताएं जताईं। चीन ने 2060 तक निवल-शून्य उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य रखा और अपने 2030 के लक्ष्यों को मजबूत किया। उसकी इस दशक के अंत तक उत्सर्जन चरम पर पहुंचाने की योजना है। भारत ने भी 2070 तक निवल-शून्य लक्ष्य हासिल करने और अक्षय ऊर्जा स्थापना में बढ़ोतरी का संकल्प लिया। भारत में 2030 तक देश की आधी बिजली का उत्पादन नवीकरणीय स्रोतों से किए जाने का लक्ष्य रखा गया है।

COP26 in Glasgow.

सीओपी26 के शुरुआती दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में कार्बन का उत्सर्जन बंद करने की घोषणाएं की गईं। ब्रिटेन ने घोषणा की कि वह कोयले का उत्पादन बंद करेगा और उसने कोयले से बिजली का उत्पादन बंद करने के लिए नए वैश्विक गठबंधन की शुरुआत की।

दुनिया के 100 से अधिक देशों ने 2030 तक मीथेन उत्सर्जन 30 प्रतिशत तक करने के नए संकल्प पर हस्ताक्षर किए। 120 से अधिक देशों ने 2030 तक वनों की कटाई रोकने का भी संकल्प लिया। अमेरिका भी उन देशों के गठबंधन में भी शामिल हो गया है, जो वैश्विक नौवहन में निवल-शून्य उत्सर्जन हासिल करने की योजना बना रहे हैं।

लेकिन इस सप्ताह विकसित देश जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में गरीब देशों की मदद के लिए हर साल 100 अरब डॉलर देने के एक दशक पुराने अपने वादे को पूरा करने से चूक गए। जलवायु परिवर्तन से निपटने संबंधी कदमों के लिए वित्तीय मदद संबंधी प्रतिबद्धताओं को पूरा करना वार्ता के दौरान भरोसा कायम करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

COP26 in Glasgow.

ग्लासगो के पहले सप्ताह में छह साल पहले पेरिस में किए गए वैश्विक वादों की तुलना में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अधिक कदम उठाए गए, लेकिन इस सम्मेलन के परिणाम ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए आवश्यक कदमों को उठाने से चूक गए।

कई विकासशील देश चाहते हैं कि अमीर देश किसी नए लक्ष्य का संकल्प लेने से पहले जलवायु परिवर्तन से निपटने संबंधी कदमों के लिए वित्तीय मदद देने की दिशा में अधिक प्रतिबद्धता बढ़ाएं। क्या ग्लासगो में आम सहमति बन पाएगी? इसके लिए शिखर सम्मेलन की अगले सप्ताह होने वाली बैठकों पर गहरी नजर रखनी होगी।

(विस्ले मोर्गन, ग्रिफिथ विश्वविद्यालय)

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