• 25 June, 2022
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सरहद पर अहंकारी चीन का मजबूत भारत से सामना

लेफ्टिनेंट जनरल विनोद भाटिया (सेवानिवृत्त)
शनि, 16 अक्टूबर 2021   |   6 मिनट में पढ़ें

10 अक्टूबर 2021 को मोल्दो (चीनी पक्ष) में लेफ्टिनेंट जनरल पीजीके मेनन, कोर कमांडर 14 कोर और उनके समकक्ष दक्षिण शिनजियांग सेना के जिला प्रमुख के बीच 13वें दौर की वार्ता 17 महीने के लंबे ‘गतिरोध’ के बाद भी सफल नही हो सकी। पैंगोंग त्सो और गोगरा में    हुई वापसी के बाद, संवेदनशील उत्तरी तट के हॉट स्प्रिंग्स/पेट्रोल प्वाइंट 15 पर भी सेना के पीछे हटने की उम्मीद थी। दोनों देश आपस में बातचीत करके शांतिपूर्ण तरीके से समाधान  के लिए सेना वार्ता को जारी रखने पर सहमत हो गए। हालांकि, बीजिंग और उनके आधिकारिक समाचारपत्र ग्लोबल टाइम्स में दिया गया बयान उनके कठोर रुख और  अहंकारी रवैये का संकेत  देता है।

पहले कोर कमांडर स्तर की वार्ता के बाद जारी की गयी प्रेस विज्ञप्ति तथा बीजिंग और नई दिल्ली दोनों के बयान सुलह और कूटनीति रूप से सही थे। इस बार यह कुछ अलग है, क्योंकि चीन का आक्रामक व्यवहार अब अहंकार भरा हो गया है, जैसा कि बयानों के लहजे से स्पष्ट है।

वार्ता के बाद चीन ने भारत पर “अपनी अनुचित और अवास्तविक मांगों पर कायम रहने का आरोप लगाया, जिससे बातचीत में मुश्किलें पैदा हुई”। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के वेस्टर्न थिएटर कमांड के प्रवक्ता सीनियर कर्नल लॉन्ग शाओहुआ ने कहा कि “स्थिति को गलत समझने की बजाय, भारतीय पक्ष को चीन-भारत सीमा पर जीत की मुश्किल स्थितियों को समझना चाहिए।”

हालांकि  भारत ने इस बयान की बड़ी मजबूती से निंदा की जो एक जिम्मेदार प्रतिक्रिया  थी। चीन ने अपनी स्थिति और मंशा का बचाव करते हुए कहा कि चीनी पक्ष सीमा पर स्थितियों को ठीक रखने और उन्हे शांत करने के बहुत प्रयास कर रहा है और द्विपक्षीय  संबंधों को बनाए रखने के लिए चीन अपनी ईमानदारी का पूरा प्रदर्शन कर रहा है। हालाँकि, भारतीय पक्ष अभी भी अपनी अनुचित और अवास्तविक मांगों पर कायम है, जिससे वार्ता में कठिनाइयों आ रही है। उन्होंने अपने कड़े रुख के लिए सीधे भारत को दोष दिया।

बाराहोटी, उत्तराखंड और यांग्त्ज़ी (पूर्वी तवांग), अरुणाचल प्रदेश और आस-पास के क्षेत्र में चीनी अतिक्रमण के संबंध में कोर कमांडर स्तर की वार्ता हुई। यहाँ कथित तौर पर कुछ पीएलए सैनिकों को भारतीय सेना ने हिरासत में लिया था, उन्हें स्थानीय कमांडरों के हस्तक्षेप के बाद रिहा किया जाना था। निश्चित रूप से पीएलए के लिए यह चिंता का विषय था। भारतीय सशस्त्र बलों ने ‘नो ब्लिंकिंग नो ब्रिंकमैनशिप’ के अपने दर्शन के आधार पर  चीन की तैनाती के लिए एक अपनी मजबूत प्रतिक्रिया दी।

भारत का अप्रैल/मई 2020 तक ‘यथावत स्थिति’ बनाये रखने का रुख संक्षिप्त और स्पष्ट है। दूसरी ओर चीन ने साल 1993, 1996, 2005 और 2013 के चार दशक पुराने ‘शांति समझौते’ को तोड़ दिया।

समझौतों का एकतरफा उल्लंघन करने के बाद, पीएलए के प्रवक्ता ने कहा कि “भारतीय पक्ष को दोनों देशों और दोनों सेनाओं के बीच हुए समझौतों और इसकी आम सहमति का पालन करना चाहिए, ईमानदारी दिखानी चाहिए और सीमा पर शांति और स्थिरता बनाये रखने के लिए साथ मिलकर ठोस कार्रवाई करनी चाहिए”। यह बयान आगे आने वाली   कठिन स्थिति का संकेत है, क्योंकि दोनों सेनाएं लंबी दौड़ की तैयारी कर रही हैं।

सौभाग्य से, एलएसी, एलओसी और सियाचिन ग्लेशियर पर लंबे समय से लगातार तैनाती के दशकों के अपने अनुभव के साथ, भारतीय सेना दुनिया में अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों पर युद्ध के लिए सबसे बड़ा सैनिक बल है। बुनियादी ढांचे और तकनीकी लाभों के बावजूद पीएलए को कुछ इलाकों में निरंतर तैनाती करना मुश्किल होगा, क्योंकि युवा सैनिक  कोमल होते हैं, उनमें प्रेरणा और अनुभव की कमी होती है। लगभग 40% सिपाही हैं जो दो साल की जरूरी सेवा के बाद सिविल स्ट्रीट में बेहतर जीवन की तलाश में रहते है। एलएसी  पर लंबे समय तक तैनाती होने से भारतीय सेना के लिए भी लागत बढ़ गयी है, लेकिन पीएलए के लिए लागत का बढ़ना घातक है क्योंकि वे अपने ठिकानों से संचालन करने के आदी हैं,  बचाव वाले इलाकों और प्लाटून/कंपनी के पदों से नही।

चीन हॉट स्प्रिंग्स और डेमचॉक में वर्तमान स्थिति से हटने के लिए तैयार हो सकता है, परंतु वह डेपसांग मैदानों में तैनाती करेगा, भारत को इसका हल निकालना होगा। एलएसी  पर चीन के रणनीतिक बदलाव के संकेत 14 मार्च 2013 को शी जिनपिंग द्वारा चीन का सर्वोच्च नेतृत्व ग्रहण करने के तुरंत बाद से ही महसूस किए गए थे। पीएलए ने 14 अप्रैल 2013 को 19.5 किमी की लंबी घुसपेठ की थी, जिसे 22 दिनों के बाद हल किया गया था।  1986 में सुमद्रोंग चू के बाद इस तरह की यह पहली घटना थी और उसके बाद 2014 में चुमार और 2017 में डोकलाम में इसी तरह के उल्लंघन हुए। यह एलएसी पर चीन के बदले हुए इरादे और व्यवहार के प्रति भारत को चेतावनी है।

चीन ताकत का सम्मान करता है और भारत को इसी ताकत से चीन के साथ बातचीत का  माहौल और क्षमताएं बनाने की जरूरत है। जून 2020 में गलवान की घटना के बाद से कोई हिंसक घटना नहीं हुई और शांति कायम है। यह कर्नल संतोष बाबू और उनके साथियों की वीरतापूर्ण कार्रवाई के कारण है, जिन्होंने पीएलए पर प्रभावी ढंग से समान जवाबी कार्रवाई की। यह सही है कि पीएलए द्वारा इस्तेमाल किए गए स्पाइक्स और अन्य हथियारों को   पीएलए की दूसरी इकाइयों को भी इसी तरह के उपयोग के लिए जारी किया गया होगा। वे कई और गलवान होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, लेकिन भारतीय सेना ने प्रभावी जवाबी कार्रवाई में अपनी शक्ति और संकल्प के प्रदर्शन से इसे रोक दिया। भारतीय सशस्त्र बलों  की इस मजबूत प्रतिक्रिया के कारण ही पीएलए मई 2020 में शुरू की गयी अग्रिम तैनाती   से आगे नहीं बढ़ी।

भारतीय सामरिक समुदाय के कुछ लोग सरकार और सेना द्वारा कैलाश रेंज की महत्वपूर्ण ऊंचाइयों से समय से पहले की गयी वापसी के फैसले की आलोचना कर रहे हैं, उनके अनुसार यह एक बड़े लाभ के बदले बहुत कम प्राप्ति है। कैलाश रेंज की ऊंचाइयों पर तेजी से कब्जे ने पीएलए को आश्चर्यचकित कर दिया, भारत ने पहले ऊंचाइयों पर कब्जा करने और उसके बाद उन ऊंचाइयो से हट कर अपने रणनीतिक संकल्प और लचीलेपन का प्रदर्शन किया, जिसने सबसे संवेदनशील नॉर्थ बैंक पैंगोंग त्सो में पीएलए को वापसी के लिए मजबूर  कर दिया।

कैलाश रेंज जैसे किसी भी ‘क्विड प्रो क्वो’ का एक सीमित मूल्य है। भारत ने पीएलए के साथ शांतिपूर्ण बातचीत द्वारा नार्थ बैंक पेन्गोंग त्सो से उनकी सेना की वापसी के अपने उद्देश्य को पूरा कर लिया। 1979 के वियतनाम के बाद कब्जे वाले क्षेत्रों से चीन की  इस तरह की पहली वापसी है। यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा पर  कई ‘कैलाश रेंज’ हैं।

सेना प्रमुख जनरल नरवणे ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि हमारी सेना चीनी तैनाती का मुकाबला कर रही है और हम “किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार है”। एलएसी पर बुनियादी ढांचों के विकास को काफी तेज कर दिया गया है। माउंटेन स्ट्राइक कोर का संचालन किया गया है, एलएसी के पास स्थित अत्याधुनिक राफेल ओमनी रोल एयरक्राफ्ट की हवाई सुविधाओं को बढ़ाया गया है।

भारत निश्चित रूप से लंबी दौड़ के लिए तैयार है। ‘रणनीतिक संतुलन’, यूएवी को शामिल करने, निगरानी क्षमताओं को बढ़ाने के साथ-साथ रसद में सुधार की भी पूरी तैयारी है। यह चीन के प्रति भारत के रुख में एक रक्षात्मक बदलाव का संकेत देता है, क्योंकि अब वह अप्रैल 2020 तक यथास्थिति पर समझौता वार्ता चाहता है।

जब दुनिया चीन के कोविड-19 का मुकाबला करने में व्यस्त थी, चीन ने सनत्ज़ु की उक्ति “अराजकता के बीच, एक अवसर भी है” का पालन करते हुए, अपने 27 पड़ोसियों की क्षेत्रीय अखंडता और संवेदनशीलता की पूरी तरह से अवहेलना करते हुए कई मोर्चे खोल दिये। ताइवान, वियतनाम, जापान, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस और यहां तक ​​कि अपने सबसे छोटे पड़ोसी देश भूटान के खिलाफ दक्षिण चीन सागर, पूर्वी चीन सागर में सैनिक बल  का प्रयोग किया।

हांगकांग, शिनजियांग क्षेत्र, दक्षिण मंगोलिया और तिब्बत में असंतोष के साथ चीन  आंतरिक उथल-पुथल का सामना भी कर रहा है। सीपीईसी बीआरआई के लिए प्रमुख है,  चीन का सपना है और एक मुख्य राष्ट्रीय हित है। चीन की संपत्तियों और हितों को निशाना बनाने वाले आतंकवादी हमलों में बढ़ोत्तरी  से चीन परेशान है। जबकि भारत को ‘टू फ्रंट थ्रेट’ का सामना करने और उसे कम करने के लिए तैयारी करने की आवश्यकता है, यह चीन है, जो संघर्ष के पूरे माहौल के साथ सुरक्षा चुनौतियों का सामना करता है।

चीन के विरुद्ध अपनी स्थिति को मजबूत करने और उसके नए सूचना युद्ध, जो चीन की युद्ध रणनीति का एक मजबूत हिस्सा है, भारत को उसका मुकाबला करने की जरूरत है। भारत को तीन ‘डी’ रणनीति की जरूरत है। एलएसी की रक्षा करना, हिंद महासागर पर हावी  होना और हितों की समानता और एकरूपता वाले देशों के साथ ‘बांड टू बैलेंस’ से चीन के आक्रामक व्यवहार को रोकना होगा।

भारत आज एक उभरता हुआ जिम्मेदार देश है। एक क्षेत्रीय शक्ति और एक वैश्विक नेता है। चीन ताकत का सम्मान करता है और भारत को समान ताकत से बातचीत जारी रखनी चाहिए, जबकि इसके साथ-साथ एलएसी पर सर्दियों, वसंत या गर्मियों में बड़े स्तर पर सतर्कता और तैयारी सुनिश्चित करनी होगी। भारत को तवांग, अरुणाचल प्रदेश और डोका ला/डोकलाम क्षेत्र में भी चौकसी बढ़ानी होगी क्योंकि छोटा सिलीगुड़ी गलियारा एक रणनीतिक चिंता है। स्थिति के तनावपूर्ण होने पर इन क्षेत्रों में चीनी खतरा अधिक होने की संभावना है।

चीन के साथ बातचीत  में धैर्य रखना होगा, समय इसमें बाधक नहीं हो सकता। चीन को यह समझने की जरूरत है कि भारत अपनी क्षेत्रीय अखंडता पर कोई समझौता नहीं  करेगा।

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लेखक
लेफ्टिनेंट जनरल विनोद भाटिया, पीवीएसएम, एवीएसएम, एसएम (सेवानिवृत्त) पूर्व महानिदेशक सैन्य ऑपरेशन (डीजीएमओ) हैं और सीईएनजेओडब्ल्यूएस-द सेंटर फॉर ज्वाइंट वारफेयर स्टडीज के निदेशक हैं। तीनों सेनाओं के आधिकारिक थिंक टैंक हैं।

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