• 16 May, 2022
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भारत की नई मिसाइलें: तरकश में ‘ब्रह्मास्त्र’!

ब्रिगेडियर अरविंद धनंजयन (सेवानिवृत्त), सलाहकार संपादक रक्षा
मंगल, 11 जनवरी 2022   |   8 मिनट में पढ़ें

ब्रह्मास्त्र (ब्रह्मास्त्र): एक दिव्य हथियार, अकाट्य, स्वयं भगवान ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त (निर्मित)

 भारत के ‘ब्रह्मास्त्र’, या सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल (एसएसएम) का जन्म डीआरडीओ के एकीकृत गाइड मिसाइल विकास कार्यक्रम (आईजीएमडीपी) के तहत हुआ था, जिसे 27 जुलाई 1983 को डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम के कुशल नेतृत्व में शुरू किया गया था। आईजीएमडीपी का सफर सामरिक एसएसएम पृथ्वी मिसाइल के विकास के साथ शुरू हुआ, जिसे शॉर्ट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल (एसआरबीएम) के रूप में वर्गीकृत किया गया था, और जो भारत की पहली स्वदेशी रूप से विकसित बैलिस्टिक मिसाइल थीं। परमाणु और पारंपरिक लक्ष्यों को दुश्मन के अंदर गहराई तक भेद पाने में सक्षम एक लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल की चाहत ने इंटरमीडिएट रेंज/इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (आईआरबीएम/आईसीबीएम) की अग्नि श्रृंखला का विकास किया, जिसमें फिर से प्रवेश की तकनीक और अत्यधिक तापमान पर पृथ्वी के वायुमंडल में पुनः प्रवेश की क्षमता है। अग्नि गाइडेड मिसाइल ने पहली बार 1989 में उड़ान भरी थी।

वर्तमान में पृथ्वी और अग्नि श्रृंखला की दोनों मिसाइलों के परिचालन के साथ आईजीएमडीपी परिपक्व हो गया है। इन मिसाइलों को विभिन्न रेंजों और अतिरिक्त भार के वहन के लिए विभिन्न प्रकार (पृथ्वी के लिए तीन और अग्नि के लिए पांच) में विकसित किया गया है। पृथ्वी को तरल से ठोस ईंधन प्रणोदन (पीछे से धक्‍का देकर आगे बढ़ाने वाला) में भी विकसित किया गया है, क्योंकि उसका युद्ध की परिस्थितियों में स्टोर करना और उपयोग करना अधिक कठिन था। पृथ्वी (तीनों सेवाओं और सामरिक बल कमान [एसएफसी] में सेवारत) का दायरा 750 किमी तक और अग्नि का दायरा 1000 किमी से 5000 किमी तक का था। यह महसूस किया गया कि आईजीएमडीपी के तहत एसएसएम आसानी से उन सीमाओं को पूरा नहीं करती है जिन पर सामरिक/परिचालन लड़ाइयां लड़ी जाएंगी। इस वास्तविकता के अहसास के कारण प्रहार, शौर्य और प्रलय बैलिस्टिक मिसाइलों का विकास हुआ, जिनका उद्देश्य युद्ध के मैदान में और उसके बाहर दुश्मन को मारना है। पृथ्वी के कई प्रकारों से लॉजिस्टिक संबंधी चिंता उत्पन्न हुई और युद्ध में सामरिक, परिचालन और रणनीतिक गहराई तक को लक्ष्यों पर प्रहार करने के लिए कई अन्य विकल्पों को तैनात करने की आवश्यकता महसूस की गयी। इस प्रकार एक बहुमुखी और सर्वशक्तिमान संस्करण के विकास की आवश्यकता महसूस हुई। फलस्वरूप अग्नि-पी का विकास हुआ, जिसे पुराने पृथ्वी, अग्नि-I और अग्नि-द्वितीय एसएसएम की क्षमताओं को संयोजित करने के लिए डिज़ाइन किया गया।

प्रहार, शौर्य और प्रलय बैलिस्टिक मिसाइल

जैसा कि ऊपर बताया गया है, इन मिसाइलों को सामरिक युद्धक्षेत्र में या उसके बाहर तैनात विरोधियों की पारंपरिक या परमाणु संपत्तियों को लक्षित करने के लिए विकसित किया गया है, जो कि 150 किमी या उससे अधिक की दूरी तक हो सकते हैं। सामरिक लक्ष्यों को भेदने के लिए इन मिसाइलों में अधिक गतिशीलता, उच्च सटीकता और त्वरित तैनाती की आवश्यकता होगी।

प्रहार (स्ट्राइक) 60 से 150 किमी तक प्रभावी मारक सीमा वाली सभी तरह के मौसम में कारगर एक रोड-मोबाइल, सभी तरह के क्षेत्र, एकल स्टेज, ठोस ईंधन वाली एसएसएम है। हालांकि यह टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल (टीबीएम) पारंपरिक उच्च विस्फोटक (एचई), परमाणु या सभी तरह के हधियार ले जाने में सक्षम है, इसको पारंपरिक उपयोग के लिए तैयार किया गया है। इस टीबीएम को पृथ्वी-I एसआरबीएम की जगह लेने के लिए विकसित किया गया है, जिसकी रेंज 150 किमी है। टीबीएम ने 20 जुलाई 2011 को चांदीपुर, उड़ीसा में एकीकृत परीक्षण रेंज (आईटीआर) से अपनी पहली परीक्षण उड़ान भरी और 20 सितंबर 2018 को फिर से इसका सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया। प्रहार को एक सड़क-आधारित ट्रांसपोर्टर-इरेक्टर-लॉन्चर (टीईएल) पर लॉन्च किया गया, जो छह मिसाइलों को वहन करता है।

इस प्रकार तैनाती और संचालन में महत्वपूर्ण लचीलेपन के अनुसार टीईएल को स्टैंड-अलोन मोड में संचालित किया जा सकता है। बिना किसी पूर्व तैयारी के टीईएल को 5 मिनट से भी कम समय में तैनात किया जा सकता है और एक विस्तृत दायरे में फैले विभिन्न लक्ष्यों पर मिसाइलों को दाग सकता है। युद्ध में भारत की मशीनीकृत सेना पर हमला करने के लिए विकसित पाकिस्तान के हत्फ-IX या नस्र परमाणु सक्षम टीबीएम का मुकाबला करने के लिए प्रहार सक्षम है। भारतीय सशस्त्र बलों ने 200 किमी की सीमा के साथ एक टीबीएम के विकास में रुचि दिखायी जिसके फलस्वरूप प्रनाश टीबीएम की अवधारणा हुई, जिनका विकासात्मक परीक्षण शुरू में 2021 निर्धारित था और उपयोगकर्ता परीक्षण 2023 तक किया जाना है। प्रनाश को एक पारंपरिक वारहेड ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह प्रहार के 60 किमी की तुलना में 40 किमी की न्यूनतम सीमा के साथ ठोस-ईंधन वाला होगा, इस प्रकार यह निकटवर्ती लक्ष्य को निशाना बनाता है। चूंकि टीबीएम मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (एमटीसीआर) के तहत मिसाइलों के निर्यात के लिए निर्धारित 300 किलोमीटर की सीमा के भीतर है, इसलिए भारत अन्य देशों को इस संस्करण के निर्यात पर भी विचार कर सकता है। – कम दूरी की सामरिक बैलिस्टिक मिसाइलों के क्षेत्र में यह अचूक साबित होगा।

प्रहार टीईएल (L), टीईएल से लॉन्च होता प्रहार (R) : Source-विकिपीडिया/livefistdefence.com

शौर्य (बहादुरी) डीआरडीओ द्वारा डिजाइन और भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) द्वारा निर्मित एक सड़क-मोबाइल, दो-चरण, ठोस-ईंधन वाली कनस्तर लॉन्च हाइपरसोनिक एसएसएम है। 180 से 1000 किलोग्राम के पारंपरिक एचई या परमाणु वारहेड को माउंट करने की क्षमता के कारण मिसाइल की 700 से 1900 किमी की सीमा है और इसे के-15 सागरिका सागर-लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइल (एसएलबीएम) का भूमि-आधारित उन्नत संस्करण माना जाता है, जिसका दायरा 700-750 किमी है। इसका परमाणु पेलोड 17 से 200 किलोटन हो सकता है। बड़ी रेंज की भिन्नता के कारण यह एसएसएम अग्नि श्रृंखला एसएसएम की सीमाओं के भीतर परिचालन और लक्ष्य पर हमला करने के लिए फिट बैठती है। एसएसएम को एक फाइबरग्लास कनस्तर में संग्रहित और लॉन्च किया जाता है, इस प्रकार एक टीईएल से मिसाइल को ‘कोल्ड लॉन्च’ की सुविधा है। मिसाइल को गैस से उच्च दबाव वाली गैस द्वारा अपने कनस्तर से बाहर निकाला जाता है। पहले चरण के मोटर के प्रणोदन को संभालने से पहले कनस्तर के भीतर स्थित जनरेटर, मिसाइल को 5 किमी की ऊंचाई तक ले जाता है। दूसरे चरण का मोटर मिसाइल को 33 किमी की ऊंचाई तक ले जाता है।

इसके बाद, वायुगतिकीय पंख मिसाइल की आगे की उड़ान को लक्षित लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। शौर्य में उच्च स्तर की सटीकता है और यह पृथ्वी के वायुमंडल के भीतर कम ऊचाई में पैंतरेबाज़ी कर सकता है, इस प्रकार पृथ्वी के वायुमंडल में पुन: प्रवेश के दौरान बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाने के लिए लगे विरोधियों के रडार को चकमा दे सकता है। एसएसएम की अग्नि और पृथ्वी श्रृंखला के 1 से 2 मीटर सीएस की तुलना में 0.74 मीटर के पतले क्रॉस-सेक्शन (सीएस) के कारण मिसाइल का इन-फ्लाइट डिटेक्शन और भी मुश्किल हो जाता है। 7.5 मैक तक की गति से उड़ान भरने की मिसाइल की क्षमता के कारण बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा (बीएमडी) ढालों द्वारा पता लगाने और अवरोधन को और अधिक अस्पष्ट कर दिया गया है। हाइपरसोनिक एसएसएम का अक्टूबर 2004 में आईटीआर से परीक्षण किया गया था। बेहतर अंतिम विन्यास में एसएसएम का परीक्षण 03 अक्टूबर 2020 को किया गया था। शौर्य को इस परीक्षण के बाद एसएफसी में शामिल करने के लिए अनुमोदित किया गया।

शौर्य की टेस्ट-फायरिंग (बांये) , टीईएल पर सवार (दाहिने): स्रोत-defenceview.in/military-today.com

प्रलय (विनाश) एक सड़क से परिवहन योग्य, दो-चरण, ठोस-ईंधन वाली कनस्तर-लॉन्च की गई शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल (एसआरबीएम) है। यह एसएसएम दो-चरण, ठोस-फ्यूल एक्सो-एटमॉस्फेरिक पृथ्वी डिफेंस व्हीकल (पीडीवी) बैलिस्टिक मिसाइल इंटरसेप्टर, जिसे भारत के बीएमडी प्रोग्राम के तहत विकसित किया गया है और प्रहार टीबीएम का एकीकरण है। इसे (बीएमडी) पहले के एक लेख https://chanakyaforum.com/mr-sam-boosting-efficacy-of-indias-air-defence/ में भी संक्षेप में कवर किया गया है। 370 से 700 किलोग्राम के पेलोड भार के साथ प्रलय की मारक क्षमता 150 से 500 किमी है। इसे पृथ्वी श्रृंखला की निचली सीमाओं पर लक्ष्य पर प्रहार करने और अग्नि श्रृंखला के बैलिस्टिक एसएसएम के निचले-श्रेणी के अंतर में फिट बैठाता। उच्च पेलोड वजन ब्रह्मोस की तुलना में इसे अधिक घातक बनाता है, जो सटीक होते हुए भी केवल 200 से 300 किलोग्राम का पेलोड वजन ले जा सकता है। इसके बारे में विस्तार से पढ़ें ब्रह्मोस @ चाणक्य फोरम के https://chanakyaforum.com/brahmos-cruise-missile- indias-contender-in-the-supersonic-vector-race/ )। एसआरबीएम एक ‘अर्ध-बैलिस्टिक’ मार्ग का अनुसरण करता है, जिसमें, बैलिस्टिक मिसाइल चरण के बाद, वारहेड मध्य-उड़ान पैंतरेबाज़ी और संभावित थ्रस्ट वेक्टर कंट्रोल (टीवीसी) का उपयोग करते हुए बीएमडी अवरोधन से बचते हुए सतह के लक्ष्यों पर प्रहार कर पुन: प्रवेश वाहन (एमएआरवी) मार्ग का अनुसरण करता है। मिसाइल डीआरडीओ की उच्च ऊर्जा सामग्री अनुसंधान प्रयोगशाला द्वारा विकसित नई पीढ़ी के समग्र प्रोपेलेंट (प्रणोदक) का उपयोग करती है, जिसमें अग्नि मिसाइलों की तुलना में उच्च दक्षता होती है, इस प्रकार मिसाइल के समग्र आकार और सीएस में कमी की जाती है। एसएसएम एचई प्री-फ्रैगमेंटेशन (पीएफ), पेनेट्रेशन-कम-ब्लास्ट (पीसीबी) और रनवे डेनियल पेनेट्रेशन सबमुनिशन (आरडीपीएस) कॉन्फ़िगरेशन के साथ एक पारंपरिक वारहेड माउंट कर सकता है। पारंपरिक विन्यास प्रलय को परमाणु सीमा को तोड़े बिना सामरिक और परिचालन क्षेत्र में लक्ष्यों को प्रभावी ढंग से मारने की अनुमति देता है। एसएसएम का 21 और 23 दिसंबर 2021 को बंगाल की खाड़ी में अब्दुल कलाम द्वीप (एकेआई) से सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया। एसएसएम के संचालन में शामिल होने से पहले और अधिक पुष्टिकरण परीक्षण-उड़ानें की जाने की संभावना है।

प्रलय की टेस्ट फायरिंग: Source-pib.gov.in

अग्नि पी.

अग्नि प्राइम या अग्नि पी एक ठोस-ईंधन, दो-चरण, कनस्तर लॉन्च एमआरबीएम है। एसएसएम अग्नि श्रृंखला का छठा संस्करण है। यह रेल और सड़क से ले जाने योग्य मिसाइल है। वर्तमान में सेवारत अग्नि I और II दोनों प्रकार के मिसाइलों के बेहतर विकल्प के रूप में इस मिसाइल को परिकल्पित किया गया है। अग्नि पी में मिश्रित मोटर आवरण सहित कई उन्नयन किये गय़े है जिसमें धातु मोटर आवरण की तुलना में लगातार उच्च प्रदर्शन कारक होता है, जिसके परिणामस्वरूप उच्च प्रणोदन दक्षता और महत्वपूर्ण वजन में कमी (अन्य प्रकारों की तुलना में 50% कम) होती है। इसमें अग्नि IV और V में शामिल नई मार्गदर्शन प्रौद्योगिकियां शामिल हैं। मौजूदा बीएमडी से बचने और उच्च स्ट्राइक सटीकता प्राप्त करने के लिए, एमएआरवी में चार डेल्टा फिन तैनात है। एसएसएम में 1500 से 3000 किग्रा एचई, परमाणु या थर्मोबैरिक (उच्च तापमान निरंतर विस्फोट) पेलोड के साथ 1000 से 2000 किमी की परिचालन सीमा है, जिसे एकल वारहेड के रूप में या दो एकाधिक स्वतंत्र रूप से लक्षित पुन: प्रवेश वाहनों (एमआईआरवी) के रूप में वितरित किया जाता है। अग्नि पी की सीमा इसे अग्नि I और II की श्रेणियों को प्रभावी ढंग से शामिल करने और पाकिस्तान में लगभग सभी रणनीतिक लक्ष्यों और ज्ञात परमाणु वेक्टर साइटों पर हमला करने की अनुमति देती है। यदि उपयुक्त रूप से तैनात किया गया हो तो यह दक्षिणी चीन में चीन के मिसाइल बेसों युन्नान प्रांत में कुनमिंग को भी दायरे में ले सकता है। अग्नि पी ने 28 जून 21 को एकेआई से अपनी पहली परीक्षण-उड़ान की, जिसमें उसने दो एमआईआरवी पेलोड वहन किया। इसके बाद 18 दिसंबर 21 को दूसरी सफल परीक्षण-उड़ान हुई। इसमें यह भी उल्लेख मिलता है कि अग्नि पी लंबी दूरी की चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी रॉकेट फोर्स डीएफ-26 के समान ‘कैरियर-किलर’ मिसाइल के विकास का आधार बन सकती है।

 

अग्नि पी का पहला उड़ान-परीक्षण एकेआई में अपने टीईएल से: Source- defenceview.in

इन एसएसएम की मुख्य विशेषताएं नीचे की तालिका में दी गई हैं: –

निष्कर्ष

जैसा कि ऊपर बताया गया है विभिन्न विकासों के समावेश और संचालन के साथ, भारत के एसएसएम परिवार ने सामरिक गहराई से लेकर विरोधी के गढ़ में स्थित लक्ष्य पर सटीक हमला करने की क्षमता हासिल कर ली है। भारत के एसएसएम को परमाणु वायु, भूमि और समुद्री प्लेटफार्मों की एक विस्तृत श्रृंखला से लॉन्च किया जा सकता है। ‘कैरियर किलर’ तकनीक के प्रत्यक्ष विकास से हिंद महासागर क्षेत्र की भारतीय सीमा में प्रभुत्व हासिल करने के चीन के किसी भी उद्देश्य (यदि कोई हो) को भारत सफलतापूर्वक विफल कर देगा।

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लेखक
ब्रिगेडियर अरविंद धनंजयन (सेवानिवृत्त) एक आपरेशनल ब्रिगेड की कमान संभाल चुके हैं और एक प्रमुख प्रशिक्षण केंद्र के ब्रिगेेडयर प्रभारी रहे हैं। उनका भारतीय प्रशिक्षण दल के सदस्य के रूप में दक्षिण अफ्रीका के बोत्सवाना में विदेश में प्रतिनियुक्ति का अनुभव रहा है और विदेशों में रक्षा बलों विश्वसनीय सलाहकार के रूप में उनका व्यापक अनुभव रहा है। वह हथियार प्रणालियों के तकनीकी पहलुओं और सामरिक इस्तेमाल का व्यापक अनुभव रखते हैं।

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