• 25 June, 2022
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दुनिया को जैविक और हाइब्रिड युद्ध से आगाह कर गए जनरल बिपिन रावत

कर्नल शिवदान सिंह
शुक्र, 17 दिसम्बर 2021   |   6 मिनट में पढ़ें

अचानक मृत्यु से केवल तीन दिन पहले जनरल बिपिन रावत ने विश्व को चेतावनी दी कि यदि कोरोना जैसी महामारी जैविक युद्ध में बदल जाए तो उस स्थिति में विश्व के देशों को इससे लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए। जनरल रावत ने बिम्सटेक आपदा प्रबंधन अभ्यास के कर्टन रेजर कार्यक्रम में भाग लेते हुए यह विचार रखा। बिम्सटेक संगठन बंगाल की खाड़ी के आसपास स्थित देशों का संगठन है जिसमें बांग्लादेश नेपाल, मायमार, भूटान, थाईलैंड, श्रीलंका आदि देश शामिल हैं। उन्होंने आगे कहां की सेनाओं की जिम्मेवारी बाहरी दुश्मन से लड़ने की होती है और यदि कोरोना जैसी बीमारी दुश्मन देश द्वारा फैलाई जाती है तो इस प्रकार की महामारी से लड़ने के लिए भी पूरे देश को एक युद्ध की तरह ही तैयार रहना चाहिए और इसमें सेना को एक युद्ध की तरह ही आगे रहकर अपने देश की रक्षा करनी चाहिए। जैसा कि कोरोना ने पूरे विश्व को प्रभावित किया है तो इसको भी एक प्रकार से तीसरे विश्वयुद्ध की झलक के रूप में देखा जाना चाहिए। इसलिए  इससे भी लड़ने के लिए विश्व को युद्ध की तरह ही तैयार रहना चाहिए। जैसा की सर्वविदित है चीन की वुहान प्रयोगशाला में कोरोना के वायरस को तैयार किया जा रहा था। जहां से असावधानी के कारण यह वायरस पूरे विश्व में फैल गया और विश्व के हर कोने को अपनी चपेट में लेते हुए वास्तव में विश्व युद्ध छेड़ दिया। जिसके प्रभाव पूरे विश्व में आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य के क्षेत्र में देखे गए।  जिस प्रकार युद्ध में भयानक आर्थिक और मानव क्षति होती है उसी प्रकार कोरोना के द्वारा पूरे विश्व में महाविनाश देखने में आया। विकसित और महाशक्ति कहे जाने वाले देश भी इस महाविनाश से बच नहीं पाए जिसके कारण अमेरिका में लाखों लोग मारे गए। स्वयं को विकसित देश मानने वाले इंग्लैंड फ्रांस इत्यादि देशों में भी लाखों लोग कोरोना के द्वारा मारे गए।

प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी ने एंथ्रेक्स और गलन्दर नाम के विषाणु को  दुश्मन देशों में छोड़कर उन्हें क्षति पहुंचाने की कोशिश की। इसके बाद दूसरे विश्व युद्ध में भी जर्मनी के द्वारा इसी प्रकार के जैविक हथियारों के द्वारा दुश्मन देशों को डराने और क्षति पहुंचाने के प्रयास किए गए। कोरोना से पहले विश्व में जैविक युद्ध को केवल एक विचार के रूप में ही लिया जाता था था परंतु कोरोना के बाद में अब जैविक युद्ध की सच्चाई विश्व के सामने आ गई है। 1945 में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमले के बाद में दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हो गया और संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हो गई थी। संयुक्त राष्ट्र संघ में सर्वप्रथम परमाणु बम का विनाश देखकर इसको रोकने के लिए प्रभावशाली व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र ने की। परंतु अभी तक संयुक्त राष्ट्र संघ ने कोरोना की महामारी को देखते हुए भी ऐसी कोई व्यवस्था जैविक युद्ध को रोकने के लिए नहीं की है। हालांकि 1540 नाम का प्रस्ताव इस प्रकार के महाविनाश के हथियारों  को रोकने के लिए पारित किया है, परंतु इसे और प्रभावशाली ढंग से लागू करने का कोई व्यवस्था परमाणु हथियारों की तरह नहीं है। क्योंकि अभी तक विश्व ने आज के विकासशाली युग में इस प्रकार के जैविक युद्ध द्वारा मानवता के महाविनाश के बारे में सोचा भी नहीं था। हालांकि इस प्रस्ताव में इस प्रकार के हथियारों के उत्पादन भंडारण और इस्तेमाल पर प्रतिबंध की बात कही गई है, परंतु इसमें कहीं पर भी इन हथियारों के संदेह में संदिग्ध देश में न तो जांच का प्रावधान है और न ही इनको पाए जाने पर संबंधित देश के विरुद्ध किसी प्रकार के आर्थिक प्रबंधन का ही प्रावधान है। इसके कारण अभी तक चीन के विरुद्ध कोई भी प्रभावशाली कार्यवाही विश्व की यह उच्चतम संस्था नहीं कर पाई है।

प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी ने जैविक हथियारों को एंथ्रेक्स और गलन्दर नाम की बीमारियों के जरिए प्रयोग करने के बाद उनके प्रभाव को भी देखा और समझा कि किस प्रकार लंबे समय तक इनका प्रभाव पूरी मानवता पर पड़ता है। इसलिए विश्व के देशों ने इस प्रकार के जैविक युद्ध को रोकने के लिए विचार विमर्श शुरू किया जिसके परिणाम स्वरूप 1925 में बियाना प्रोटोकॉल के रूप में एक समझौता लिया गया। जिसमें केवल इतना ही प्रावधान था कि कोई भी देश जैविक हथियारों को पहले इस्तेमाल नहीं करेगा। इसमें इनके निर्माण, इनके भंडारण और इनके सत्यापन इत्यादि पर कोई प्रावधान नहीं था। इसलिए यह प्रोटोकॉल एक प्रकार से जैविक युद्ध को रोकने में नाकाम रही जिसके परिणाम स्वरूप दूसरे विश्व युद्ध में भी जैविक हथियारों का प्रयोग कुछ देशों ने किया। इसको देखते हुए जैविक युद्ध को प्रभावशाली तरीके से रोकने के लिए इंग्लैंड में 1972 में विचार विमर्श हुआ और इस विचार के परिणाम स्वरूप 26 मार्च 1975 को जैविक युद्ध को रोकने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संधि बनी जिसमें इस समय विश्व के 185 देश सदस्‍य है। इस संधि में इन हथियारों के निर्माण भंडारण और प्रयोग पर पूरी तरह से पाबंदी है। इसके बाद 1986 में इस संधि में यह भी जोड़ा गया कि हर साल सदस्‍य देश विश्वास बहाली के लिए 6 सूत्रीय एक रिपोर्ट देंगे जिसमें इस संधि के प्रस्तावों  के बारे में अपने देश की स्थिति से इस संधि के मुख्यालय को सूचित करेंगे। इस संधि में भी कुछ कमियां हैं जिनके कारण यह संधि प्रभावशाली होती नजर नहीं आ रही है। इस संधि में संदिग्ध देश में निरीक्षण और इस संधि के उल्लंघन के लिए दोषी देश के ऊपर प्रतिबंधों का कोई प्रावधान नहीं है क्योंकि इस संधि को अभी तक संयुक्त राष्ट्र संघ ने मान्यता नहीं दी है और इस कारण संयुक्त राष्ट्र संघ दोषी देश के विरुद्ध कार्रवाई करने में असमर्थ है। हालाकी कोरोना के लिए पूरा विश्व चीन को दोषी मान रहा है परंतु संयुक्त राष्ट्र संघ ने अभी तक न इस पर विचार किया है और न ही चीन को कोई इस पर नोटिस या प्रतिबंध लगाया है। इसलिए अब समय आ गया है जब संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रभावशाली सदस्‍यों को जैविक युद्ध के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाकर इसे प्रभावशाली ढंग से लागू करें। जिनमें संदेह होने पर संदिग्ध देश में निरीक्षण का प्रावधान हो और इन  हथियारों के पाए जाने पर या प्रयोग करने के बाद में दोषी देश पर सख्त प्रतिबंध जाने चाहिए।

United Nations Secretary-General Antonio Guterres.

तकनीकी क्षेत्र में उन्नति के बाद आज के युग में युद्ध की पद्धति में भी बहुत बड़ा बदलाव हुआ है। इस युग में परंपरागत आमने-सामने के युद्ध के स्थान पर हाइब्रिड प्रणाली से युद्ध किया जाता है। जिसके अंतर्गत सीमाओं पर सेना के द्वारा लड़े गए युद्ध के स्थान पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से तरह तरह का प्रोपेगेंडा जिसके द्वारा दुश्मन देश में सरकार के प्रति विद्रोह पैदा हो तथा दुश्मन देश के देशवासियों के द्वारा ही देश के टुकड़े हो जाए। इसके साथ साथ इस हाइब्रिड युद्ध में जैविक युद्ध का प्रयोग भी हो सकता है। जैसा कि चीन के द्वारा कोरोना वायरस को फैला कर करने का इरादा था। इस हाइब्रिड युद्ध में सेना की भी शक्ति प्रदर्शन करने के लिए पहले उतनी ही आवश्यकता है। इसलिए सेना का प्रयोग आज के युग में कहीं पर भी 19वीं शताब्दी की तरह नहीं हो रहा है, जैसा कि द्वितीय विश्व युद्ध और 70-80 के दशक तक देखने में आता था। एक अमेरिकन अर्थशास्त्री ने चीन की कार्यप्रणाली पर प्रकाश डालते हुए कहा है की चीन अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए पहले संबंधित देशों को आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से आतंकित करता है। इसके बाद सहानुभूति दिखाते हुए उस देश के नजदीक जाता है। ऐसा करके ही चीन ने एशिया के देशों पर अपना प्रभाव बढ़ाया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है चीन ने पाकिस्तान को एक प्रकार से अपना गुलाम देश बना लिया है। हालांकि कोरोना का विस्फोट विशेषज्ञों के अनुसार चीन की वुहान प्रयोगशाला से लापरवाही में हुआ है। परंतु फिर भी यह सत्य है कि चीन जैविक युद्ध की तैयारी कोरोना वायरस के रूप में कर रहा था।

Outbreak of the coronavirus disease (COVID-19) in Brooklyn, New York City.

कोरोना के महाविनाश को देखने के बाद में विश्व की पूरी मानव जाति आतंकित है। इसलिए अब जैविक युद्ध को रोकने के लिए विश्व के समस्त देशों और महाशक्तियों को इस दिशा में ठोस कदम उठाकर संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा ऐसे प्रावधान कराए जाने चाहिए जिनसे विश्व का कोई देश मानवता के इस प्रकार के विनाश के बारे में सोच भी न सके। परंतु यहां पर संयुक्त राष्ट्र संघ की सबसे बड़ी समस्या विश्व की 5 महाशक्तियों के पास वीटो पावर का होना है। इसी कारण अभी तक कोरना पर संयुक्त राष्ट्र संघ में विचार-विमर्श भी नहीं हुआ है। कोरोना के विरुद्ध इस तरह की निष्क्रियता से ऐसा प्रतीत होता है कि जिस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध के बाद में लीग ऑफ नेशन की स्थापना हुई थी और द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद लीग ऑफ नेशन अपना प्रभाव खो देने के बाद खत्म हो गई थी। उसी प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित संयुक्त राष्ट्र संघ भी कोरोना वायरस रूपी तृतीय विश्व युद्ध की झांकी देखने के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ भी उसी प्रकार समाप्त न हो जाए।

इसलिए विश्व की महाशक्तियों को मानवता की भलाई को देखते हुए अपने वीटो पावर को जैविक युद्ध पर प्रभावशाली कार्यवाही को रोकने के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और संयुक्त राष्ट्र संघ को उचित कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, जिससे पूरे विश्व की मानव जाति स्वयं को सुरक्षित महसूस कर सकें।

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लेखक
कर्नल शिवदान सिंह (बीटेक एलएलबी) ने सेना की तकनीकी संचार शाखा कोर ऑफ सिग्नल मैं अपनी सेवाएं देकर सेवानिवृत्त हुए। 1986 में जब भारतीय सेना उत्तरी सिक्किम में पहली बार पहुंची तो इन्होंने इस 18000 फुट ऊंचाई के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र को संचार द्वारा देश के मुख्य भाग से जोड़ा। सेवानिवृत्ति के बाद इन्हें दिल्ली के उच्च न्यायालय ने समाज सेवा के लिए आनरेरी मजिस्ट्रेट क्लास वन के रूप में नियुक्त किया। इसके बाद वह 2010 से एक स्वतंत्र स्तंभकार के रूप में हिंदी प्रेस में सामरिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के विषयों पर लेखन कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में चाणक्य फोरम हिन्दी के संपादक हैं।

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